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बृहत्संहिता • अध्याय 47 • श्लोक 1
अथ मयूरचित्रकं व्याख्यायते। तत्रादावेव तत्प्रदर्शनार्थमाह- दिव्यान्तरिक्षाश्रयमुक्तमादौ मया फलं शस्तमशोधनं च । प्रायेण चारेषु समागमेषु युद्धेषु मार्गादिषु विस्तरेण ॥
पहले चार (चन्द्रग्रह समागम), युद्ध, मार्ग (शुक्रचार) और आदि (मण्डल) में दिव्य तथा आन्तरिक्ष के आश्रयवश शुभाशुभ फल विस्तारपूर्वक मैंने (वराहमिहिर ने) कहे हैं; फिर उसी फलप्रसङ्ग को लेकर यहाँ कहना संक्षेप करने वाले
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