पहले चार (चन्द्रग्रह समागम), युद्ध, मार्ग (शुक्रचार) और आदि (मण्डल) में दिव्य तथा आन्तरिक्ष के आश्रयवश शुभाशुभ फल विस्तारपूर्वक मैंने (वराहमिहिर ने) कहे हैं; फिर उसी फलप्रसङ्ग को लेकर यहाँ कहना संक्षेप करने वाले
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