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बृहत्संहिता • अध्याय 47 • श्लोक 2
वराहमिहिरस्य युक्तमेतत् न समासकृदसाविति तस्य दोषः । भूयो कर्तुं यद्वर्हिचित्रकमिति वाच्यमिदमुक्तफलानुगीति प्रथितं वराङ्गम् ॥
वराहमिहिर के लिये ठीक नहीं है; क्योंकि विस्तार करना उनका दोष है। पर यहाँ पुनरुक्त दोष है, ऐसा पण्डितों को नहीं कहना चाहिये। यतः यह बर्हिचित्रक नामक प्रकरण संहिता का प्रसिद्ध अङ्ग है।
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