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बृहत्संहिता • अध्याय 47 • श्लोक 3
स्वरूपमेव तस्य तत्प्रकीर्तितानुकीर्तनम् । ब्रवीम्यहं न धदिदं तथाऽपि मेऽत्र वाच्यता ॥
पुनरुक्त फेल होने से ही इस मयूरचित्रक का निश्चित स्वरूप ज्ञात होगा अर्थात् पूर्व फल-कथन के अतिरिक्त पुनः यहाँ पर मयूरचित्रक का सम्बन्ध लेकर उसी फल का वर्णन कर देना ही उसका स्वरूप है; अत: फिर नहीं कहने से भी मेरी निन्दा होगी ।
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