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बृहत्संहिता • अध्याय 47 • श्लोक 17
धनुः स्थायी रूक्षो रुधिरसदृशः क्षुद्धयकरो बलोद्योगं चन्द्रः कथयति जयं ज्याऽस्य च यतः। गयां शृङ्गो गोध्नो निधनमपि सस्यस्य कुरुते ज्वलन् धूमायन् वा नृपतिमरणायैव भवति ॥
यदि चन्द्र धनुषाकार होकर रूक्ष और रक्त वर्ण का दिखाई दे तो दुर्भिक्ष और सेनाओं में परस्पर युद्ध का भय करता है तथा इस चन्द्र की ज्या जिस तरफ रहती है, उस उरफ के राजाओं की विजय होती है। गौ के शृङ्ग की तरह शृङ्गा हो तो गौ और धान्यों का नाश करता है तथा प्रज्ज्वलित या धूम की तरह दिखाई दे तो राजाओं के मरण के लिये होता है।
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