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बृहत्संहिता • अध्याय 47 • श्लोक 12
मुनीनभिजितं ध्रुवं मघवतश्च भं संस्पृशन् शिखी घनविनाशकृत् कुशलकर्महा शोकदः। भुजङ्गमथ संस्पृशेद् भवति वृष्टिनाशो ध्रुवं क्षयं व्रजति विद्वतो जनपदश्च बालाकुलः ॥
यदि केतु सप्तर्षि मण्डल, अभिजित् नक्षत्र, ध्रुवतारा या ज्येष्ठा नक्षत्र को स्पर्श करे तो मेषों का नाश, अमङ्गल, कर्मों की हानि और शोक देने वाला होता है। यदि आश्लेषा नक्षत्र को स्पर्श करे तो निश्वय ही वृष्टि का नाश और क्षुधा-पिपासा आदि से पीड़ित बालकों को साथ लेकर लोग यहाँ से चल कर नष्ट होते हैं।
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