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बृहत्संहिता • अध्याय 47 • श्लोक 4
उत्तरवीथिगता द्युतिमन्तः क्षेमसुभिक्षशिवाय समस्ताः । दक्षिणमार्गगता द्युतिहीनाः क्षुद्धयतस्करमृत्युकरास्ते ॥
यदि प्रकाशयुत होकर ग्रह उत्तर बोधियों (नाग, गज और ऐरावतसंज्ञक यीथी) में गमन करें तो क्षेम, सुभिक्ष और कल्याण के लिये होते हैं। यदि प्रकाराहीन होकर दक्षिण मार्ग (मृग, अज और दहनसंज्ञक वीथी) में गमन करें तो दुर्भिक्ष, चोरभय और मृत्यु को करते हैं।
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