यद्विस्तरेण कचितं मुनिभिस्तदस्मिन् सर्व मया निगदितं पुनरुक्तवर्जम् । बुत्वाऽपि कोकिलरुतं बलिभुग्विरीति यत्तत् स्वभावकृतमस्य पिकं न जेतुम् ॥
गर्ग आदि मुनियों ने विस्तारपूर्वक जिन विषयों को बड़ा है, पुनरुक्त दोष रहते उन सब विषयों को इस मयूरचित्र नामक अध्याय में मैंने कहा है। इतने पर भी यदि दुर्जन गण बोलते हो रहे से मेरी क्या हानि है? क्योंकि कोयत के शब्द मुस्कर थी जो भाक शब्द करता है, यह स्वाभाविक शब्द होता है, न कि कोपल को जोड़ने की से।
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