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अध्याय 44 — अथ नीराजनाध्यायः
बृहत्संहिता
28 श्लोक • केवल अनुवाद
मेघरूप पलक तथा चन्द्र-सूर्यरूप दोनों नेत्र वाले भगवान् कमलनाम के नेत्र खोलने पर घोड़ा, हाथी और मनुष्यों को नीराजन (जल का स्पर्श) करना चाहिये ।
कार्तिक या आश्विन के शुक्ल पक्ष की द्वादशी, अष्टमी, पूर्णिमा या अमावास्या के दिन नीराजन नामक शान्ति करनी चाहिये।
नगर के ईशान कोण में उत्तम भूमि पर प्रशस्त वृक्ष से सोलह हाथ ऊँचा और दश हाथ चौड़ा एक तोरण बनाना चाहिये।
विजयसार, गूलर या अर्जुन वृक्ष की डालियों से युत तथा बाँसों से रचित मत्स्य ध्वज और चक्रों से अलंकृत शान्तिगृह बनाना चाहिये ।
भिलावा, शाली धान्य, कूठ और श्वेत सरसों को प्रतिसरा (कुङ्कुमरञ्जित या पीले पुष्टि के लिये शान्ति गृह में स्थित घोड़ों के गले में बाँधना चाहिये।
शान्तिगृह में सूर्य, वरुण, विश्वेदेव, ब्रह्मा, इन्द्र और विष्णु के मन्त्रों से सात दिन तक घोड़ों को शान्ति करनी चाहिये ।
पुण्याहवाचन, शङ्खध्वनि, पेरी की ध्वनि तथा गीत के शब्दों से भयरहित, पूजित घोड़े को डराना और चाबुक आदि से मारना नहीं चाहिये।
आठवें दिन तोरण के दक्षिण तरफ आगे स्थित बेदी पर कुशा और वृक्षवल्कल से ढकी हुई अग्नि का स्थापन करना चाहिये ।
चन्दन, कूठ, मीठ, हरिताल, मैनशिल, कंगनी (कौन), वच, गुरुच, अञ्जन, हलदी, सुवर्णपुष्पी, अग्निमन्या (अरणी),
श्वेता (गिरिकर्णी = अपराजिता), पूर्णकोशा, महाश्वेता (उजला गंगा फल), त्रायमाण (चिरायते का फल), सहदेवी, नागपुष्य, स्वगुप्ता (क्याँच = कवाछ),
शतावरी, सोमवल्ली- इन सब ओषधियों को बराबर- बराबर लेकर पूर्ण कलश में शहद, पायस देकर यावकों (कुरधियों से युत अनेक प्रकार के भक्ष्य पदार्थों के साथ बलि देना चाहिये
खैर, ढाक, गूलर, गम्भारी और पीपल की लकड़ी की समिधा बनाकर सम्पत्ति की इच्छा करने वाले राजा को सोना या चाँदी की सुवा बनानी चाहिये ।
व्याघ्र के चर्म पर पूर्वाभिमुख होकर अग्नि के समीप में वैद्य और ज्यौतिषी के साथ श्रीमान् राजा बैठे।
यात्रा नामक पुस्तक के ग्रहयज्ञविधि में तथा इन्द्रध्वजलक्षणाध्याय में वेदी, पुरोहित और अग्नि के जो लक्षण कहे हैं, वह इस नीराजनाध्याय में भी समझना चाहिये।
वक्ष्यमाण लक्षणों से युत घोड़ा और हाथी का अक्षत, श्वेत वस्त्र, माला, धूप आदि से पूजन कर अनेक प्रकार के वाद्य और पुण्याह शब्दों से युत अपने
आश्रम के समीपस्थित तोरण के पास मधुर वाणियों से सान्त्वना देते हुए धीरे-धीरे लाना चाहिये।
जिस राजा के द्वारा लाया गया घोड़ा दक्षिण चरण उठाकर खड़ा रहे, वह राजा शीघ्र ही बिना परिश्रम शत्रु को जीत लेता है। यदि घोड़ा डर जाय तो राजा का शुभ नहीं होता। यहाँ घोड़ा का ग्रहण उपलक्षणमात्र है
अत: घोड़े की जगह हाथी को भी लेना चाहिये। हाथी और घोड़े की शेष चेष्टाओं का फल 'यात्रा' नामक ग्रन्थ में जिस प्रकार मैंने कहा है, उसी प्रकार युक्तिपूर्वक यहाँ पर भी विचार करना चाहिये।
पुरोहित अत्र के पिण्ड को अभिमन्त्रित करके घोड़े को दे दे। यदि घोड़ा उस अन के पिण्ड को सूपे या कुछ खा जाय तो राजा की विजय करने वाला, अन्यथा पराजय करने वाला होता है।
गूलर की एक छोटी-सी डाली को कलशजल में दुवाकर शान्तिक और पौष्टिक मन्त्रों से घोड़ा, राजा, हाथी और सेनाओं को स्पर्श (सिक्त) करे।
फिर ब्राह्मण राष्ट्र को वृद्धि के लिये शान्ति करके अभियार कर्म में उक्त आवर्षण मन्त्रों को पढ़कर मिट्टी की बनाई हुई शत्रु को मूर्ति के बक्षस्थल को तीक्ष्ण शूल से
बाद में पुरोहित खलौन (लगाम) को अभिमन्त्रित करके घोड़े के मुख में दे। फिर उस पर नीराजन किया हुआ राजा बैठकर सेनाओं के साथ ईशान कोण की ओर गमन करे ।
मृदङ्ग और शङ्ख की ध्वनि से हर्षित होकर हाथियों के झरते हुये मदजलों को सुगन्धि से पुत वायु वाला ( क्योंकि शरद् ऋतु में सुगन्धित वायु चलती है) और मुकुट में जड़ी हुई मगियों के प्रान्त भाग में
में चलित किरणों से युत शारदीय सूर्य की तरह (क्योंकि शरद् ऋतु में सूर्य तेजस्वी होते हैं) राजा अथवा सुगन्धित वायु को सेवन करने वाले शुक्ल चामरों से कम्पमान सुन्दर भाला और बख थाले मानों
हंसपक्तियों से व्याप्त और सुगन्धियुत बापुओं से युक्त हिमालय की तरह राजा अथवा अनेक वर्ण वाले रत्न तथा हीराजों से व्याप्त मुकुट, कुण्डल और बाजू से भूषित होने के कारण
इन्द्रधनु को कान्ति धारण किया हुआ राजा अथवा उड़ते हुये घोड़े, पृथ्वी को विदारण करते हुये हाथी और शत्रु को जीतने वाले मनुष्यों के साथ मानो देवताओं से घिरे हुये इन्द्र के समान राजा गमन करे।
अथवा होरा-मोठी से युत खेत माला, चेत पगड़ी, खेत चन्दन तथा घेत वखों से युत, छत्रधारी और हाथी पर बैठा हुआ राजा मेघ के ऊपर और चन्द्र के नीचे विराजमान शुक्र की तरह गमन करे। यहाँ मेघ के स्थान पर हाथी, चन्द्र के स्थान पर छत्र और शुक्र के स्थान पर राजा को समझना चाहिये।
जिस राजा के हर्पित मनुष्य, थोड़े और हाथियों से युत, निर्मल खद्ग आदि से प्रकाशमान, विकारसहित और शत्रु के लिये भयावह सेनागण हो, यह शीघ्र हो पृथ्वी को जोत लेता है।
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