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बृहत्संहिता • अध्याय 44 • श्लोक 15
लक्षणयुक्तं तुरगं द्विरदवरं चैव दीक्षितं स्नातम्। अहतसिताम्बरगन्यत्रग्घूमाभ्यर्चितं कृत्वा ॥
वक्ष्यमाण लक्षणों से युत घोड़ा और हाथी का अक्षत, श्वेत वस्त्र, माला, धूप आदि से पूजन कर अनेक प्रकार के वाद्य और पुण्याह शब्दों से युत अपने
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