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बृहत्संहिता • अध्याय 44 • श्लोक 20
कलशोदकेषु शाखामाप्लाव्यौदुम्बरी स्पृशेत् तुरगान् । शान्तिकपौष्टिकमन्त्रैरेवं सेनां अनृपनागाम् ॥
गूलर की एक छोटी-सी डाली को कलशजल में दुवाकर शान्तिक और पौष्टिक मन्त्रों से घोड़ा, राजा, हाथी और सेनाओं को स्पर्श (सिक्त) करे।
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