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बृहत्संहिता • अध्याय 44 • श्लोक 14
यात्रायां यदभिहितं ग्रहयज्ञविधौ महेन्द्रकेतौ च । वेदीपुरोहितानललक्षणमस्मिंस्तदवधार्यम् ॥
यात्रा नामक पुस्तक के ग्रहयज्ञविधि में तथा इन्द्रध्वजलक्षणाध्याय में वेदी, पुरोहित और अग्नि के जो लक्षण कहे हैं, वह इस नीराजनाध्याय में भी समझना चाहिये।
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