प्राप्तेऽष्टमेऽह्नि कुर्यादुदङ्मुखं तोरणस्य दक्षिणतः । कुशचीरावृतमाश्रममग्निं पुरतोऽस्य वेद्यां च ॥
आठवें दिन तोरण के दक्षिण तरफ आगे स्थित बेदी पर कुशा और वृक्षवल्कल से ढकी हुई अग्नि का स्थापन करना चाहिये ।
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