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बृहत्संहिता • अध्याय 44 • श्लोक 16
आश्रमतोरणमूलं समुपनयेत् सान्त्वयन् शनैर्वाचा। वादित्रशङ्ख पुण्याहनिःस्वनापूरितदिगन्तम् ॥
आश्रम के समीपस्थित तोरण के पास मधुर वाणियों से सान्त्वना देते हुए धीरे-धीरे लाना चाहिये।
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