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बृहत्संहिता • अध्याय 44 • श्लोक 21
शान्तिं राष्ट्रविवृद्धचे कृत्वा भूयोऽभिचारकैर्मन्त्रैः । मृण्मयमरि विभिन्याच्डूलेनोरः स्थले विप्रः ॥
फिर ब्राह्मण राष्ट्र को वृद्धि के लिये शान्ति करके अभियार कर्म में उक्त आवर्षण मन्त्रों को पढ़कर मिट्टी की बनाई हुई शत्रु को मूर्ति के बक्षस्थल को तीक्ष्ण शूल से
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