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बृहत्संहिता • अध्याय 44 • श्लोक 3
नगरोत्तरपूर्वदिशि प्रशस्तभूमौ प्रशस्तदारुमयम् । षोडशहस्तोच्छ्रायं दशविपुलं तोरणं कार्यम् ॥
नगर के ईशान कोण में उत्तम भूमि पर प्रशस्त वृक्ष से सोलह हाथ ऊँचा और दश हाथ चौड़ा एक तोरण बनाना चाहिये।
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