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बृहत्संहिता • अध्याय 44 • श्लोक 25
नैकवर्णमणिवन्द्र भूषितै भूषितो मुकुटकुण्डलाङ्गदैः । भूरिरलकिरणानुरञ्जितः शक्रकार्मुकरुचिं समुद्वहन् ॥
हंसपक्तियों से व्याप्त और सुगन्धियुत बापुओं से युक्त हिमालय की तरह राजा अथवा अनेक वर्ण वाले रत्न तथा हीराजों से व्याप्त मुकुट, कुण्डल और बाजू से भूषित होने के कारण
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