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अध्याय 6 — छठवाँ अध्याय

विदुर नीति
47 श्लोक • केवल अनुवाद
विदुरजी कहते हैं - समय नवयुवक व्यक्ति के प्राण ऊपर को उठने लगते हैं, फिर जब वह वृद्ध के स्वागत में उठकर खड़ा होता, और प्रणाम करता है, तो पुनः प्राणों को वास्तविक स्थिति में प्राप्त करता है।
धीर पुरुष को चाहिये, जब कोई साधु पुरुष अतिथि के रूप में घर पर आवे, तो पहले आसन देकर, जल लाकर उसके चरण पखारे, फिर उनका कुशल पूछकर अपनी स्थिति बतावे, तदनन्तर आवश्यकता समझकर अन्न भोजन करवाये।
वेदवेत्ता बाह्मण, जिसके घर दाता के लोभ, भय, या कंजूसी के कारण, जल मधुपर्क, और गौ को नहीं स्त्वाकार करता, श्रेष्ठ पुरुष, उस गृहस्थ का जीवन व्यर्थ वताया है।
वैद्य, चीर-फाड़ करने वाला (जर्राह), ब्रह्मचर्य से भ्रष्ट, चोर, क्रूर शराबी, गर्भहत्यारा, सेनाजीवी, और वेद विक्रेता, ये यद्यपि पैर धोने के योग्य नहीं हैं, तथापि यदि अतिथि होकर आवें तो विशेष प्रिय, यानी आदर के योग्य है।
नमक, पका हुआ अत्र, दही, दूध, मधु, तेल, घी, तिल, मांस, फल, मूल, साग, लाल कपड़ा, सब प्रकार की गन्ध, और गुड़, इतनी वस्तुएँ बेचने योम्य नहीं हैं।
जो क्रोध न करने वाला, ढेला-पत्थर और सुबर्ण को, एक सा समझने वाला, शोकहीन, सन्धि वि्रह से रहित, निन्दा-प्रशसा से शून्य, प्रिय अप्रिय का त्याग करने वाला, तथा उदासीन है, वही भिक्षुक (संन्यासी) है।
जो नीवार (जंगली चावल), कन्द-मूल, इङ्गद (लिसीड़ा), और सागू खाकर निर्वाह करता है, मन को वश में रखता है, अग्निहोत्र करता है, वन में रहकर भी अतिथि सेवा में, सदा सावधान रहता है, वही पुण्यात्मा तपस्वी (वानप्रस्थी), श्रेष्ठ माना गया है।
बुद्धिमान् पुरुष की बुराई करके, इस विश्वास पर निश्चित्त न रहे, कि मै दूर हूँ। बुद्धिमान की बाँहे बड़ी लम्बी होती हैं, सताया जाने पर वह उन्हीं बाँहों से बदला लेता है।
जो विश्वास का पात्र नहीं है, उसका तो विश्वास करे ही नहीं, किन्तु जो विश्वासपात्र है, उस पर भी अधिक विश्वास न करे। विश्वास से जो भय उत्पन्न होता है, वह मूल का भी उच्छेद कर डालता है।
मनुष्य को चाहिये कि वह, ईष्ष्या रहित स्त्रियों का रक्षक, सम्पत्ति का न्यायपूर्वक विभाग करने वाला प्रियवादी, स्वच्छ, तथा स्त्रियों के निकट मीठे वचन बोलने वाला हो, परंतु उनके वश में कभी न हो।
स्त्रीयां घर की लक्ष्मी कही गयी हैं। वे अत्यंत सौभाग्यशालिनी, पूजा के योग्य पवित्र, तथा घर की शोभा है। अतः, इनकी विशेष रुप से रक्षा करनी चाहिये।
अन्तः पुर की रक्षा का कार्य, पिता को सौंप दे, रसोई-घर का प्रबंध माता के हाथों में दे दे, गौओं की सेवा में, अपने समान व्यक्ति को नियुक्त करे, और कृषि का कार्य स्वयं करे।
सेवकों द्वारा वाणिज्य-व्यापार, और पुत्रो के द्वारा बाह्मणो की सेवा करे। जल से अग्नि, ब्राह्मण से क्षत्रिय, और पत्थर से लोहा पैदा हुआ है। इनका तेज सर्वत्र व्याप्त होने पर भी, अपने उत्पत्तिस्थान मे शान्त हो जाता है।
अच्छे कुल में उत्पन्न, अग्नि के समान तेजस्वी, क्षमाशील, और विकारशुन्य पुरुष, सदा काष्ठ में अग्नि की भाँति शान्तभाव से स्थित रहते हैं।
जिस राजा की मन्त्रणा को, उसके बहिरङ्ग एवं अन्तरङ्ग सभासद् तक नही जानते, सब और दूष्टि रखने वाला वह राजा चिरकाल तक ऐस्वर्य का उपभोग करता है।
धर्म, काम, और अर्थसम्ब्ध कार्य को, करने से पहले न बताये, करके ही दिखावे। ऐसा करने से आपनी मन्त्रणा, दुसरो पर प्रकट नहीं होती।
पर्वत की चोटी, अथवा राजमहल पर चढ़कर, एकान्त स्थान में जाकर, या जंगल में तृण आदि से, अनावृत स्थान पर मन्त्रणा करनी चाहिये।
हे भरतवंशी, मित्र के परम मंत्र को जानने का कोई अधिकारी नहीं है।
चाहे वह अज्ञानी हो, या मित्रवत, वह विद्वान है, या निःस्वार्थ।
राजा अच्छी तरह परीक्षा किये बिना, किसी को अपना मन्त्री न बनावे, क्योंकि धन की प्राप्ति, और मन्त्र की रक्षा का भार, मन्त्री पर ही रहता है।
जिसके धर्म, अर्थ, और काम विषयक, सभी कार्यो को पूर्ण होने के बाद ही, सभासद्गण जान पाते हैं, वही राजा समस्त राजाओ में श्रेस्ट हैं। अपने मन्त्र को गुप्त रखने वाले उस राजा को निःसन्देह सिद्धि प्राप्त होती है।
जो मोहवश बुरे कर्म करता है, वह उन कार्यो का विपरीत परिणाम होने से, अपने जीवन से भी हाथ धो बैठता है।
उत्तम कर्मो का अनुष्ठान तो सुख देने वाला होता है, किन्तु उन्ही का अनुष्ठान न किया जाय, तो बह पश्चाताप का कारण माना गया है।
जैसे वेदों को पढ़े बिना, ब्राह्मण श्राद्ध का अधिकारी नहीं होता, उसी प्रकार सन्धि, विग्रह, यान, आसन, द्वैधीभाव, और समाश्रय नामक छः गुणों को जाने बिना, कोई गुप्त मन्त्रणा सुनने का अधिकारी नहीं होता।
राजन्! जो सन्धि-विग्रह आदि छः गुणों की जानकारी के कारण प्रसिद्ध है, स्थिति, वृ्धि, और ह्रास को जानता है, तथा जिसके स्वभाव की सब लोग प्रशंसा करते हैं, उसी राजा के अधीन पृथ्वी रहती है।
जिसके क्रोध, और हर्ष व्यर्थ नहीं जाते, जो आवश्यक काम की स्वयं देख-भाल करता है, और खजाने की भी स्वयं जानकारी रखता है, उसकी पृथ्वी पर्याप्त धन देने वाली ही होती है।
भूपति को चाहिये, कि अपने राजा नाम से, और राजोचित छन्न धारण से, सतुष्ट रहे। सेवको को पर्यान्न धन दे, सब अकेले ही न हडप ले।
ब्राह्मण को ब्राह्मण जानता है, स्त्री को उसका पति जानता है, मन्त्री को राजा जानता है, और राजा को भी राजा ही जानता है।
वश मे आये हुए, वध योग्य शत्रु को कभी छोड़ना नहीं चाहिये। यदि अपना बल अधिक न हो, तो नम्र होकर उसके पास समय बिताना चाहिये, और बल होने पर उसे मार डालना चाहिये, क्यांकि यदि शत्रु मारा न गया, तो उससे शीघ्र ही भय उपस्थित होता है।
देवता, ब्राह्मण, राजा, बुद्ध, बालक, और रोगी पर होने वाले क्रोध को प्रयत्न पूर्वक सदा रोकना चाहिये।
निरर्थक कलह करना मूर्खो का काम है, बुद्धिमान पुरुष को इसका त्याग करना चाहिये, ऐसा करने से उसे लोक में बश मिलता है, और अनर्थ का सामना नहीं करना पड़ता।
जिसके प्रसन्न होने का कोई फल नहीं, तथा ज़िसका क्रोध भी व्यर्थ होता, ऐसे राजा को प्रजा, उसी भाति नहीं चाहती, जैसे स्त्री नपुंसक पति को।
बुद्धि धन की प्राप्ति के लिए नहीं है, न ही मूर्खता समृद्धि के लिए है। एक बुद्धिमान व्यक्ति दुनिया के इतिहास को जानता है और कोई नहीं।
भारत ! मूर्ख मनुष्य विद्या, शील, अवस्था, बुद्धि, धन, और कुल मे बड़े माननीय पुरुषों का सदा अनादर किया करता है।
जिसका चरित्र निन्दनीय है, जो मूर्ख, गुणों में दोष देखने वाला अधार्मिक, बुरे वचन बीलने वाला, और क्रोधी है, उसके ऊपर शीघ्र ही अनर्थ टूट पड़ते हैं।
ठगी न करना, दान देना, बात पर कायम रहना, और अच्छी तरह कहीं हुई हित की बात, ये सब सम्पूर्ण भूतों को अपना बना लेते हैं।
किसी को भी धोखा न देने वाला, चतुर, कृतज्ञ, बुद्धिमान्, और सरल राजा, खजाना समाप्त हो जाने पर भी सहायकों को पा जाता है, अर्थात् उसे सहायक मिल जाते हैं।
धैर्य, मनोनिग्रह, इन्द्रिय संयम, पवित्रता, दया, कोमल वाणी, और मित्र से द्रोह न करना, ये सात बातें लक्ष्मी को बढ़ाने वाली है।
राजन! जो अपने आश्रितो मे धन का ठीक-ठाक बॅटवारा नहीं करता, तथा जो दुष्ट, कृत्घन और निर्लज्ज है, ऐसा राजा इस लोक में त्याग देने योग्य है।
जो स्वयं दोषी होकर भी, निर्दोष आत्मीय व्यक्ति को कुपित करता है, वह सर्प युक्त घर में रहने वाले मनुष्य की भाँति, रात में सुख से नहीं सो सकता।
भारत! जिनके ऊपर दोषारोपण करने से, योग और क्षेम मे बाधा आता हो, उन लोगों को देवता को भाँति, सदा प्रसन्न रखना चाहिये।
जो धन आदि पदार्थ, स्त्री, प्रमादी, पतित, और नीच परुषो के हाथ में सौप दिये जाते हैं, वे संशय में पड़ जाते हैं।
राजन्! जहां का शासन स्त्री, जुआरी, और बालक के हाथ में है, वहाँ के लोग नदी में पत्थर की नाव पर बैठने वाले की भांति, विपत्ति के समुद्र में डूब जाते हैं।
जो लोग जितना आवश्यक है, उतने ही काम में लगे रहते हैं, अधिक में हाथ नहीं डालते, उन्हें मैं पंडित मानता हूँ, क्यांकि अधिक में हाथ डालना, संधर्ष का कारण होता है।
जुआरी जिसकी तारीफ करता है, चारण जिसकी प्रशंसा का गान करते हैं, और वेश्याएँ जिसकी बढ़ाई किया करती है, वह मनुष्य जीता ही मुर्दे के समान है।
भारत! आपने उन महान् धनुर्धर, और अत्यन्त तेजस्वी पाण्डवों को छोड़कर, यह महान् ऐश्वर्य का भार दुर्याधन के ऊपर रख दिया है।
इसलिये आप शीघ्र ही, उस ऐश्रर्यमद से मृढ़ दुर्योधन को, त्रिभुवन के साम्राज्य से गिरे हुए बालि की भांति, इस राज्य से भ्रष्ट होते देखियेगा।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
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