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विदुर नीति • अध्याय 6 • श्लोक 31
निरर्थं कलहं प्राज्ञो वर्जयेन्मूढ सेवितम् । कीर्तिं च लभते लोके न चानर्थेन युज्यते ॥
निरर्थक कलह करना मूर्खो का काम है, बुद्धिमान पुरुष को इसका त्याग करना चाहिये, ऐसा करने से उसे लोक में बश मिलता है, और अनर्थ का सामना नहीं करना पड़ता।
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