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विदुर नीति • अध्याय 6 • श्लोक 26
अमोघक्रोधहर्षस्य स्वयं कृत्यान्ववेक्षिणः। आत्मप्रत्यय कोशस्य वसुधेयं वसुन्धरा ॥
जिसके क्रोध, और हर्ष व्यर्थ नहीं जाते, जो आवश्यक काम की स्वयं देख-भाल करता है, और खजाने की भी स्वयं जानकारी रखता है, उसकी पृथ्वी पर्याप्त धन देने वाली ही होती है।
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