अमोघक्रोधहर्षस्य स्वयं कृत्यान्ववेक्षिणः।
आत्मप्रत्यय कोशस्य वसुधेयं वसुन्धरा ॥
जिसके क्रोध, और हर्ष व्यर्थ नहीं जाते, जो आवश्यक काम की स्वयं देख-भाल करता है, और खजाने की भी स्वयं जानकारी रखता है, उसकी पृथ्वी पर्याप्त धन देने वाली ही होती है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
विदुर नीति के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
विदुर नीति के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।