यं प्रशंसन्ति कितवा यं प्रशंसन्ति चारणाः ।
यं प्रशंसन्ति बन्धक्यो न स जीवति मानवः ॥
जुआरी जिसकी तारीफ करता है, चारण जिसकी प्रशंसा का गान करते हैं, और वेश्याएँ जिसकी बढ़ाई किया करती है, वह मनुष्य जीता ही मुर्दे के समान है।
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