वश मे आये हुए, वध योग्य शत्रु को कभी छोड़ना नहीं चाहिये। यदि अपना बल अधिक न हो, तो नम्र होकर उसके पास समय बिताना चाहिये, और बल होने पर उसे मार डालना चाहिये, क्यांकि यदि शत्रु मारा न गया, तो उससे शीघ्र ही भय उपस्थित होता है।
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