करिष्यन्न प्रभाषेत कृतान्येव च दर्शयेत् ।
धर्मकामार्थ कार्याणि तथा मन्त्रो न भिद्यते ॥
धर्म, काम, और अर्थसम्ब्ध कार्य को, करने से पहले न बताये, करके ही दिखावे। ऐसा करने से आपनी मन्त्रणा, दुसरो पर प्रकट नहीं होती।
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