यस्य मन्त्रं न जानन्ति बाह्याश्चाभ्यन्तराश् च ये।
स राजा सर्वतश्चक्षुश्चिरमैश्वर्यमश्नुते ॥
जिस राजा की मन्त्रणा को, उसके बहिरङ्ग एवं अन्तरङ्ग सभासद् तक नही जानते, सब और दूष्टि रखने वाला वह राजा चिरकाल तक ऐस्वर्य का उपभोग करता है।
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