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विदुर नीति • अध्याय 6 • श्लोक 10
अनीर्ष्युर्गुप्तदारः स्यात्संविभागी प्रियंवदः । श्लक्ष्णो मधुरवाक्स्त्रीणां न चासां वशगो भवेत् ॥
मनुष्य को चाहिये कि वह, ईष्ष्या रहित स्त्रियों का रक्षक, सम्पत्ति का न्यायपूर्वक विभाग करने वाला प्रियवादी, स्वच्छ, तथा स्त्रियों के निकट मीठे वचन बोलने वाला हो, परंतु उनके वश में कभी न हो।
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