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विदुर नीति • अध्याय 6 • श्लोक 7
नीवार मूलेङ्गुद शाकवृत्तिः सुसंयतात्माग्निकार्येष्वचोद्यः । वने वसन्नतिथिष्वप्रमत्तो धुरन्धरः पुण्यकृदेष तापसः ॥
जो नीवार (जंगली चावल), कन्द-मूल, इङ्गद (लिसीड़ा), और सागू खाकर निर्वाह करता है, मन को वश में रखता है, अग्निहोत्र करता है, वन में रहकर भी अतिथि सेवा में, सदा सावधान रहता है, वही पुण्यात्मा तपस्वी (वानप्रस्थी), श्रेष्ठ माना गया है।
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