न स रात्रौ सुखं शेते स सर्प इव वेश्मनि ।
यः कोपयति निर्दोषं स दोषोऽभ्यन्तरं जनम् ॥
जो स्वयं दोषी होकर भी, निर्दोष आत्मीय व्यक्ति को कुपित करता है, वह सर्प युक्त घर में रहने वाले मनुष्य की भाँति, रात में सुख से नहीं सो सकता।
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