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अध्याय 1 — तत्त्वबोध

तत्त्वबोध
42 श्लोक • केवल अनुवाद
मैं ज्ञान प्रदान करने वाले गुरु वासुदेवेन्द्र योगीन्द्र को नमस्कार कर, मुमुक्षुओं के हित के लिए तत्त्वबोध का वर्णन करता हूँ।
हम मोक्ष के साधन स्वरूप तत्त्व-विवेक की प्रक्रिया का वर्णन करेंगे, जो साधन-चतुष्टय (विवेक, वैराग्य, शमादि षट्संपत्ति, मुमुक्षुत्व) से सम्पन्न अधिकारियों के लिए उपयुक्त है।
प्रश्न: साधनचतुष्टय क्या है? उत्तर: साधनचतुष्टय चार प्रकार के साधन हैं — नित्य और अनित्य वस्तुओं का विवेक, इस लोक और परलोक के भोगों के फलों में वैराग्य, शम आदि छह गुणों की सम्पत्ति, तथा मोक्ष प्राप्ति की तीव्र इच्छा
प्रश्न: नित्य और अनित्य वस्तुओं का विवेक क्या है? उत्तर: नित्य वस्तु केवल ब्रह्म है। उससे भिन्न जो कुछ भी है, वह सब अनित्य है। यही नित्य और अनित्य वस्तुओं का विवेक है।
प्रश्न: वैराग्य क्या है? उत्तर: इस लोक और स्वर्ग के भोगों में इच्छा का अभाव ही वैराग्य है।
प्रश्न: शम आदि साधन-सम्पत्ति क्या है? उत्तर: शम, दम, उपरति, तितिक्षा, श्रद्धा और समाधान — ये छह गुण शमादि साधन-सम्पत्ति कहलाते हैं। प्रश्न: शम क्या है? उत्तर: मन का निग्रह (मन को वश में रखना) ही शम है। प्रश्न: दम क्या है? उत्तर: चक्षु आदि बाह्य इन्द्रियों का निग्रह (इन्द्रियों को वश में रखना) ही दम है। प्रश्न: उपरति क्या है? उत्तर: अपने धर्म का पालन करना ही उपरति है। प्रश्न: तितिक्षा क्या है? उत्तर: शीत, उष्ण, सुख, दुःख आदि को सहन करने की क्षमता ही तितिक्षा है। प्रश्न: श्रद्धा कैसी होती है? उत्तर: गुरु और वेदान्त के वचनों में विश्वास ही श्रद्धा है। प्रश्न: समाधान क्या है? उत्तर: चित्त की एकाग्रता ही समाधान है।
प्रश्न: मुमुक्षुत्व क्या है? उत्तर: "मुझे मोक्ष प्राप्त हो" — ऐसी इच्छा ही मुमुक्षुत्व है। यही साधनचतुष्टय है। इसके पश्चात् मनुष्य तत्त्व-विवेक का अधिकारी होता है।
प्रश्न: तत्त्व-विवेक क्या है? उत्तर: आत्मा सत्य है और उसके अतिरिक्त जो कुछ भी है, वह सब मिथ्या है। यही तत्त्व-विवेक है। प्रश्न: आत्मा कौन है? उत्तर: जो स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर से भिन्न है, पाँच कोशों से परे है, तीनों अवस्थाओं का साक्षी है, तथा जिसका स्वरूप सत्-चित्-आनन्द है, वही आत्मा है।
प्रश्न: स्थूल शरीर क्या है? उत्तर: पञ्चीकृत पञ्चमहाभूतों से बना हुआ, सत्कर्मों से प्राप्त, तथा सुख-दुःख आदि भोगों का आश्रय जो शरीर है, वही स्थूल शरीर कहलाता है। यह छः विकारों से युक्त होता है — अस्ति (अस्तित्व में रहता है), जायते (जन्म लेता है), वर्धते (बढ़ता है), विपरिणमते (परिवर्तन को प्राप्त होता है), अपक्षीयते (क्षीण होता है) और विनश्यति (नष्ट हो जाता है)। यही स्थूल शरीर है।
प्रश्न: सूक्ष्म शरीर क्या है? उत्तर: अपञ्चीकृत पञ्चमहाभूतों से बना हुआ, सत्कर्मों से प्राप्त, तथा सुख-दुःख आदि भोगों के साधन के रूप में स्थित जो शरीर है, वह सूक्ष्म शरीर कहलाता है। यह सत्रह अवयवों से युक्त होता है, अर्थात् — पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच प्राण, एक मन, तथा एक बुद्धि। इन सत्रह कलाओं के साथ जो स्थित रहता है, वही सूक्ष्म शरीर है।
प्रश्न: पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ कौन-सी हैं? उत्तर: श्रवण, स्पर्श, दृष्टि, रसना और घ्राण — ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं। प्रश्न: ज्ञानेन्द्रियों के अधिष्ठाता देवता कौन हैं? उत्तर: श्रवणेन्द्रिय के देवता दिक्-देवता हैं। स्पर्शेन्द्रिय के देवता वायु हैं। दृष्टीन्द्रिय के देवता सूर्य हैं। रसनेन्द्रिय के देवता वरुण हैं। घ्राणेन्द्रिय के देवता अश्विनीकुमार हैं। प्रश्न: ज्ञानेन्द्रियों के विषय क्या हैं? उत्तर: श्रवणेन्द्रिय का विषय शब्द का ग्रहण है। स्पर्शेन्द्रिय का विषय स्पर्श का ग्रहण है। दृष्टीन्द्रिय का विषय रूप का ग्रहण है। रसनेन्द्रिय का विषय रस का ग्रहण है। घ्राणेन्द्रिय का विषय गन्ध का ग्रहण है।
प्रश्न: पाँच कर्मेन्द्रियाँ कौन-सी हैं? उत्तर: वाणी, हाथ, पैर, गुदा और उपस्थ — ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ हैं। प्रश्न: कर्मेन्द्रियों के अधिष्ठाता देवता कौन हैं? उत्तर: वाणी के देवता अग्नि हैं। हाथों के देवता इन्द्र हैं। पैरों के देवता विष्णु हैं। गुदा के देवता मृत्यु हैं। उपस्थ के देवता प्रजापति हैं। प्रश्न: कर्मेन्द्रियों के विषय क्या हैं? उत्तर: वाणी का विषय बोलना है। हाथों का विषय वस्तुओं को ग्रहण करना है। पैरों का विषय चलना है। गुदा का विषय मल का त्याग करना है। उपस्थ का विषय आनन्द की अनुभूति है।
प्रश्न: कारण शरीर क्या है? उत्तर: जो अनिर्वचनीय, अनादि अविद्या-स्वरूप, स्थूल और सूक्ष्म शरीर का कारण मात्र, अपने वास्तविक स्वरूप का अज्ञान तथा निर्विकल्प रूप है, वही कारण शरीर कहलाता है।
प्रश्न: तीन अवस्थाएँ कौन-सी हैं? उत्तर: जाग्रत अवस्था, स्वप्न अवस्था और सुषुप्ति अवस्था — ये तीन अवस्थाएँ हैं।
प्रश्न: जाग्रत अवस्था क्या है? उत्तर: जिस अवस्था में श्रवण आदि ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा शब्द आदि विषयों का ज्ञान होता है, वह जाग्रत अवस्था कहलाती है। स्थूल शरीर का अभिमान करने वाला आत्मा विश्व कहलाता है।
प्रश्न: स्वप्न अवस्था क्या है? उत्तर: जाग्रत अवस्था में जो देखा और सुना गया है, उससे उत्पन्न वासना के कारण, निद्रा के समय जो प्रपञ्च प्रतीत होता है, वह स्वप्न अवस्था कहलाती है। सूक्ष्म शरीर का अभिमान करने वाला आत्मा तैजस कहलाता है।
प्रश्न: सुषुप्ति अवस्था क्या है? उत्तर: जिस अवस्था के विषय में जागने पर यह अनुभव होता है कि — "मैं कुछ भी नहीं जानता था और मैंने सुखपूर्वक निद्रा का अनुभव किया" — वह सुषुप्ति अवस्था कहलाती है। कारण शरीर का अभिमान करने वाला आत्मा प्राज्ञ कहलाता है।
प्रश्न: पाँच कोश कौन-से हैं? उत्तर: अन्नमय कोश, प्राणमय कोश, मनोमय कोश, विज्ञानमय कोश और आनन्दमय कोश — ये पाँच कोश हैं।
प्रश्न: अन्नमय कोश क्या है? उत्तर: जो अन्न के रस से उत्पन्न होता है, अन्न के रस से ही वृद्धि को प्राप्त होता है, और अंत में अन्नरूप पृथ्वी में विलीन हो जाता है, वह अन्नमय कोश कहलाता है। यही स्थूल शरीर है।
प्रश्न: प्राणमय कोश क्या है? उत्तर: प्राण आदि पाँच वायु तथा वाणी आदि पाँच कर्मेन्द्रियों से युक्त जो कोश है, वह प्राणमय कोश कहलाता है।
प्रश्न: मनोमय कोश क्या है? उत्तर: मन और पाँच ज्ञानेन्द्रियों के मिलन से जो कोश बनता है, वह मनोमय कोश कहलाता है।
प्रश्न: विज्ञानमय कोश क्या है? उत्तर: बुद्धि और पाँच ज्ञानेन्द्रियों के मिलन से जो कोश बनता है, वह विज्ञानमय कोश कहलाता है।
प्रश्न: आनन्दमय कोश क्या है? उत्तर: कारण शरीररूप अविद्या में स्थित मलिन सत्त्व, जो प्रिय आदि वृत्तियों से युक्त है, वह आनन्दमय कोश कहलाता है। यही पाँच कोश हैं।
प्रश्न: आत्मा पाँच कोशों से भिन्न कैसे है? उत्तर: "मेरा शरीर", "मेरे प्राण", "मेरा मन", "मेरी बुद्धि" और "मेरा अज्ञान" — ये सब अपने से भिन्न होने के कारण जाने जाते हैं। जिस प्रकार कंगन, कुण्डल, घर आदि वस्तुएँ "मेरी" कहकर अपने से भिन्न जानी जाती हैं, उसी प्रकार पाँच कोश आदि भी "मेरे" के रूप में जाने जाने के कारण आत्मा नहीं हैं, बल्कि आत्मा से भिन्न हैं।
प्रश्न: तब आत्मा कौन है? उत्तर: आत्मा का स्वरूप सत्-चित्-आनन्द है। प्रश्न: सत् क्या है? उत्तर: जो तीनों कालों (भूत, वर्तमान और भविष्य) में सदैव स्थित रहता है, वह सत् है। प्रश्न: चित् क्या है? उत्तर: जिसका स्वरूप ज्ञान है, वह चित् है। प्रश्न: आनन्द क्या है? उत्तर: जिसका स्वरूप सुख है, वह आनन्द है। उत्तर: इस प्रकार अपने आत्मा को सत्-चित्-आनन्द स्वरूप जानना चाहिए।
अब चौबीस तत्त्वों की उत्पत्ति की प्रक्रिया का वर्णन किया जाएगा।
ब्रह्म के आश्रय में स्थित, सत्त्व, रजस् और तमस् — इन तीन गुणों से युक्त जो शक्ति है, वही माया है।
माया से आकाश उत्पन्न हुआ। आकाश से वायु उत्पन्न हुई। वायु से तेज उत्पन्न हुआ। तेज से जल उत्पन्न हुआ। और जल से पृथ्वी उत्पन्न हुई।
इन पाँच तत्त्वों में से आकाश के सात्त्विक अंश से श्रवणेन्द्रिय उत्पन्न हुई। वायु के सात्त्विक अंश से स्पर्शेन्द्रिय उत्पन्न हुई। अग्नि के सात्त्विक अंश से दृष्टीन्द्रिय उत्पन्न हुई। जल के सात्त्विक अंश से रसनेन्द्रिय उत्पन्न हुई। तथा पृथ्वी के सात्त्विक अंश से घ्राणेन्द्रिय उत्पन्न हुई।
इन पाँच तत्त्वों के समष्टि सात्त्विक अंश से मन, बुद्धि, अहंकार और चित्त रूप अन्तःकरण उत्पन्न हुए। मन का स्वरूप संकल्प और विकल्प करना है। बुद्धि का स्वरूप निश्चय करना है। "मैं करता हूँ" ऐसा भाव अहंकार है। चिन्तन करने वाला चित्त है। मन के अधिष्ठाता देवता चन्द्रमा हैं, बुद्धि के ब्रह्मा, अहंकार के रुद्र और चित्त के वासुदेव हैं।
इन पाँच तत्त्वों में से आकाश के राजस अंश से वागिन्द्रिय (वाणी) उत्पन्न हुई। वायु के राजस अंश से पाणीन्द्रिय (हाथ) उत्पन्न हुई। अग्नि के राजस अंश से पादेन्द्रिय (पैर) उत्पन्न हुई। जल के राजस अंश से उपस्थेन्द्रिय उत्पन्न हुई। पृथ्वी के राजस अंश से गुदेन्द्रिय उत्पन्न हुई। इन पाँच तत्त्वों के समष्टि राजस अंश से पाँच प्राण उत्पन्न हुए।
इन पाँच तत्त्वों के तामस अंश से पञ्चीकृत पञ्चमहाभूत उत्पन्न होते हैं। पञ्चीकरण कैसे होता है? इन पाँच महाभूतों के तामस अंश वाले प्रत्येक भूत को दो भागों में विभाजित किया जाता है। उनमें से एक आधा भाग अलग रखा जाता है। दूसरे आधे भाग को पुनः चार भागों में विभाजित किया जाता है। फिर प्रत्येक भूत के आधे भाग में अन्य चार भूतों के एक-एक चौथाई भाग का मिश्रण किया जाता है। इस प्रकार पञ्चीकरण की प्रक्रिया पूर्ण होती है। इन पञ्चीकृत पञ्चमहाभूतों से स्थूल शरीर की उत्पत्ति होती है। इस प्रकार पिण्ड (व्यष्टि) और ब्रह्माण्ड (समष्टि) की एकता स्थापित होती है।
स्थूल शरीर में प्रतिबिम्बित ब्रह्म को जीव कहा जाता है। वही जीव अपनी प्रकृति के कारण ईश्वर को अपने से भिन्न जानता है। अविद्या की उपाधि से युक्त आत्मा जीव कहलाता है, और माया की उपाधि से युक्त वही आत्मा ईश्वर कहलाता है। इस प्रकार उपाधियों के भेद के कारण जीव और ईश्वर में भेद की दृष्टि उत्पन्न होती है। जब तक यह जीव-ईश्वर भेद-बुद्धि बनी रहती है, तब तक जन्म-मरण आदि रूप संसार से निवृत्ति नहीं होती। अतः जीव और ईश्वर में भेद की बुद्धि को स्वीकार नहीं करना चाहिए।
यदि यह कहा जाए कि अहंकारयुक्त और अल्पज्ञ जीव तथा निरहंकार और सर्वज्ञ ईश्वर में "तत्त्वमसि" जैसे महावाक्य के द्वारा अभेद-बुद्धि कैसे हो सकती है, क्योंकि दोनों के धर्म परस्पर विरोधी हैं, तो इसका उत्तर यह है कि ऐसा नहीं है। स्थूल और सूक्ष्म शरीर का अभिमान करने वाला जीव "त्वम्" पद का वाच्यार्थ है। किन्तु उपाधियों से रहित, समाधि-दशा में स्थित, शुद्ध चैतन्य "त्वम्" पद का लक्ष्यार्थ है। इसी प्रकार सर्वज्ञत्व आदि गुणों से युक्त ईश्वर "तत्" पद का वाच्यार्थ है, जबकि उपाधियों से रहित शुद्ध चैतन्य "तत्" पद का लक्ष्यार्थ है। इस प्रकार जीव और ईश्वर का चैतन्यस्वरूप से अभेद है, और इस अभेद को स्वीकार करने में कोई बाधा नहीं है।
इस प्रकार वेदान्त के वचनों और सद्गुरु के उपदेश से जिन लोगों में समस्त प्राणियों में ब्रह्म की बुद्धि उत्पन्न हो जाती है, वे जीवन्मुक्त कहलाते हैं। अब प्रश्न होता है कि जीवन्मुक्त कौन है? जिस प्रकार मनुष्य का यह दृढ़ निश्चय होता है कि "मैं शरीर हूँ", "मैं पुरुष हूँ", "मैं ब्राह्मण हूँ" या "मैं शूद्र हूँ", उसी प्रकार जिसका यह दृढ़ और प्रत्यक्ष ज्ञान हो जाता है कि "मैं न ब्राह्मण हूँ, न शूद्र हूँ, न पुरुष हूँ; बल्कि मैं असंग, सत्-चित्-आनन्द स्वरूप, प्रकाशस्वरूप, सर्वान्तर्यामी तथा चिदाकाशस्वरूप हूँ", वही जीवन्मुक्त है। "मैं ही ब्रह्म हूँ" — इस अपरोक्ष ज्ञान के द्वारा मनुष्य समस्त कर्म-बन्धनों से पूर्णतः मुक्त हो जाता है।
यदि पूछा जाए कि कर्म कितने प्रकार के होते हैं, तो उनका आगामी, संचित और प्रारब्ध — इन तीन भेदों के अनुसार तीन प्रकार बताए गए हैं।
ज्ञान की उत्पत्ति के पश्चात् ज्ञानी के शरीर द्वारा जो पुण्य अथवा पापरूप कर्म किया जाता है, उसे आगामी कर्म कहा जाता है।
संचित कर्म वह है, जो अनन्त करोड़ों जन्मों के बीजरूप में संचित होकर, पूर्व में अर्जित कर्मों के रूप में विद्यमान रहता है। उसे संचित कर्म कहा जाता है।
यदि पूछा जाए कि प्रारब्ध कर्म क्या है, तो उत्तर है कि जो कर्म इस शरीर की उत्पत्ति करके इस लोक में सुख-दुःख आदि का अनुभव कराता है, उसे प्रारब्ध कर्म कहा जाता है। यह प्रारब्ध कर्म केवल भोग के द्वारा ही नष्ट होता है; अर्थात् प्रारब्ध कर्मों का क्षय भोग से ही होता है
संचित कर्म "मैं ही ब्रह्म हूँ" — इस दृढ़ ज्ञान से नष्ट हो जाता है। आगामी कर्म भी ज्ञान के द्वारा नष्ट हो जाता है। इसके अतिरिक्त, आगामी कर्मों का ज्ञानी के साथ वैसा ही कोई सम्बन्ध नहीं रहता, जैसा कमल के पत्ते पर स्थित जल का उससे नहीं होता।
इसके अतिरिक्त, जो लोग ज्ञानी की स्तुति, भक्ति और पूजा करते हैं, उन्हें ज्ञानी के द्वारा किए गए आगामी पुण्य कर्मों का फल प्राप्त होता है। और जो लोग ज्ञानी की निन्दा करते हैं, उससे द्वेष रखते हैं या उसे कष्ट पहुँचाते हैं, उन्हें ज्ञानी के द्वारा किए गए समस्त आगामी पापकर्मों का फल प्राप्त होता है। अर्थात् सुहृद (हितैषी) लोग पुण्य को ग्रहण करते हैं और दुर्हृद (द्वेष रखने वाले) लोग पाप को ग्रहण करते हैं।
इस प्रकार आत्मज्ञानी संसार-सागर को पार करके इसी जीवन में ब्रह्मानन्द को प्राप्त कर लेता है। क्योंकि श्रुति कहती है — "आत्मज्ञानी शोक को पार कर जाता है"। और स्मृति में भी कहा गया है कि चाहे वह काशी में शरीर का त्याग करे अथवा चाण्डाल के घर में, यदि उसे ज्ञान की प्राप्ति हो चुकी है, तो वह वासना-रहित होकर मुक्त ही होता है। इस प्रकार श्री शङ्करभगवत्पादाचार्य द्वारा रचित तत्त्वबोध प्रकरण समाप्त हुआ।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
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