अध्याय 1 — तत्त्वबोध
तत्त्वबोध
42 श्लोक • केवल अनुवाद
इस प्रकार वेदान्त के वचनों और सद्गुरु के उपदेश से जिन लोगों में समस्त प्राणियों में ब्रह्म की बुद्धि उत्पन्न हो जाती है, वे जीवन्मुक्त कहलाते हैं।
अब प्रश्न होता है कि जीवन्मुक्त कौन है? जिस प्रकार मनुष्य का यह दृढ़ निश्चय होता है कि "मैं शरीर हूँ", "मैं पुरुष हूँ", "मैं ब्राह्मण हूँ" या "मैं शूद्र हूँ", उसी प्रकार जिसका यह दृढ़ और प्रत्यक्ष ज्ञान हो जाता है कि "मैं न ब्राह्मण हूँ, न शूद्र हूँ, न पुरुष हूँ; बल्कि मैं असंग, सत्-चित्-आनन्द स्वरूप, प्रकाशस्वरूप, सर्वान्तर्यामी तथा चिदाकाशस्वरूप हूँ", वही जीवन्मुक्त है।
"मैं ही ब्रह्म हूँ" — इस अपरोक्ष ज्ञान के द्वारा मनुष्य समस्त कर्म-बन्धनों से पूर्णतः मुक्त हो जाता है।