यदि पूछा जाए कि प्रारब्ध कर्म क्या है, तो उत्तर है कि जो कर्म इस शरीर की उत्पत्ति करके इस लोक में सुख-दुःख आदि का अनुभव कराता है, उसे प्रारब्ध कर्म कहा जाता है। यह प्रारब्ध कर्म केवल भोग के द्वारा ही नष्ट होता है; अर्थात् प्रारब्ध कर्मों का क्षय भोग से ही होता है।
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