इस प्रकार आत्मज्ञानीसंसार-सागर को पार करके इसी जीवन में ब्रह्मानन्द को प्राप्त कर लेता है। क्योंकि श्रुति कहती है — "आत्मज्ञानी शोक को पार कर जाता है"।
और स्मृति में भी कहा गया है कि चाहे वह काशी में शरीर का त्याग करे अथवा चाण्डाल के घर में, यदि उसे ज्ञान की प्राप्ति हो चुकी है, तो वह वासना-रहित होकर मुक्त ही होता है।
इस प्रकार श्री शङ्करभगवत्पादाचार्य द्वारा रचित तत्त्वबोध प्रकरण समाप्त हुआ।
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