मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
तत्त्वबोध • अध्याय 1 • श्लोक 42
तथा चात्मवित्संसारं तीर्त्वा ब्रह्मानन्दमिहैव प्राप्नोति। तरति शोकमात्मवित् इति श्रुतेः। तनुं त्यजतु वा काश्यां श्वपचस्य गृहेऽथ वा। ज्ञानसम्प्राप्तिसमये मुक्ताऽसौ विगताशयः। इति स्मृतेश्च। इति श्रीशङ्करभगवत्पादाचार्यप्रणीतः तत्त्वबोधप्रकरणं समाप्तम्।
इस प्रकार आत्मज्ञानी संसार-सागर को पार करके इसी जीवन में ब्रह्मानन्द को प्राप्त कर लेता है। क्योंकि श्रुति कहती है — "आत्मज्ञानी शोक को पार कर जाता है"। और स्मृति में भी कहा गया है कि चाहे वह काशी में शरीर का त्याग करे अथवा चाण्डाल के घर में, यदि उसे ज्ञान की प्राप्ति हो चुकी है, तो वह वासना-रहित होकर मुक्त ही होता है। इस प्रकार श्री शङ्करभगवत्पादाचार्य द्वारा रचित तत्त्वबोध प्रकरण समाप्त हुआ।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
तत्त्वबोध के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

तत्त्वबोध के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें