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तत्त्वबोध • अध्याय 1 • श्लोक 12
वाक्पाणिपादपायूपस्थानीति पञ्चकर्मेन्द्रियाणि। वाचो देवता वह्निः। हस्तयोरिन्द्रः। पादयोर्विष्णुः। पायोर्मृत्युः। उपस्थस्य प्रजापतिः। इति कर्मेन्द्रियदेवताः। वाचो विषयः भाषणम्। पाण्योर्विषयः वस्तुग्रहणम्। पादयोर्विषयः गमनम्। पायोर्विषयः मलत्यागः। उपस्थस्य विषयः आनन्द इति।
कर्म की पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं - वाणी, हाथ, पैर, गुदा और जननेंद्रिय। कर्मेन्द्रियों के अधिष्ठाता देवता हैं - वाणी की अग्नि, हाथों के इन्द्र, पैरों के विष्णु, गुदा के यम और जननेंद्रिय के प्रजापति। - वाणी का काम बोलना है - हाथों का काम पकड़ना है - पैरों का चलना है - गुदा का काम है मल और - जननेन्द्रिय का निष्कासन, सुख (संपत्ति)
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