यदि यह कहा जाए कि अहंकारयुक्त और अल्पज्ञजीव तथा निरहंकार और सर्वज्ञईश्वर में "तत्त्वमसि" जैसे महावाक्य के द्वारा अभेद-बुद्धि कैसे हो सकती है, क्योंकि दोनों के धर्म परस्पर विरोधी हैं, तो इसका उत्तर यह है कि ऐसा नहीं है।
स्थूल और सूक्ष्म शरीर का अभिमान करने वाला जीव "त्वम्" पद का वाच्यार्थ है। किन्तु उपाधियों से रहित, समाधि-दशा में स्थित, शुद्ध चैतन्य "त्वम्" पद का लक्ष्यार्थ है।
इसी प्रकार सर्वज्ञत्व आदि गुणों से युक्त ईश्वर "तत्" पद का वाच्यार्थ है, जबकि उपाधियों से रहित शुद्ध चैतन्य "तत्" पद का लक्ष्यार्थ है।
इस प्रकार जीव और ईश्वर का चैतन्यस्वरूप से अभेद है, और इस अभेद को स्वीकार करने में कोई बाधा नहीं है।
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