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तत्त्वबोध • अध्याय 1 • श्लोक 24
मदीयं शरीरं मदीयाः प्राणाः मदीयं मनश्च मदीया बुद्धिर्मदीयं अज्ञानमिति स्वेनैव ज्ञायते तद्यथा मदीयत्वेन ज्ञातं कटककुण्डल गृहादिकं स्वस्माद्भिन्नं तथा पञ्चकोशादिकं स्वस्माद्भिन्नम् मदीयत्वेन ज्ञातमात्मा न भवति॥
जिस प्रकार चूड़ी, कुण्डली, घर आदि 'मेरा' कहलाने वाले 'मैं' से भिन्न सब हैं, उसी प्रकार पाँच कोश आदि मेरे शरीर, मेरे प्राण, मेरे मन, मेरी बुद्धि के नाम से जाने जाते हैं। और मेरा ज्ञान और इसलिए स्वयं नहीं हैं।
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