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अध्याय 26 — षड्विंशतितम अध्याय
शिवभारतम्
62 श्लोक • केवल अनुवाद
लोग भयभीत हो गए, व्यापारी पलायन कर गए, सासवट को लुट लिया, शर्प को घेर लिया, पुणे पर हमला हो गया, इंदापूर पर कब्जा हो गया, चाकण चोरो का बहुतेक प्रदेश शत्रुसेना के कब्जे में हो गया, पुत्र शिवाजी समृद्ध व अत्यन्त क्रुद्ध हतोत्साहित पन्हाळ किले पर ही जोहर के साथ लड़ रहा था। ऐसे समय जाधवराव की बेटी, शहाजी की धर्मपत्नी जिजाबाई इसी जगह वीररस से परिपूर्ण होकर युद्ध की भाषा बोलने लगी।
राजगड़ पर रहने वाली शिवाजी की माता अपने किले की रक्षा के कार्य में लग गई।
तदनन्तर धार्मिक सेनापति नेताजी बहुत बड़ी सेना लेकर सम्पूर्ण शाहपूर को जलाकर, शत्रुओं को भगाकर, शिवाजी का समाचार प्रसाद की तरह सुनकर हिलाला के साथ शिवपट्टण आ गया।
उसके बाद स्नेह से युक्त, पुत्र के दर्शन के लिए चिरकाल से उत्सुक, पन्हाळकिले को स्वयं जाने के लिए तैयार हुई, क्रोध को प्राप्त हुई, अपनी बड़ी सेना से युक्त वह शहाजी राजा की राणी को नेताजी ने राजगड़ पर देखा।
मानो कोई अपराध किया हो ऐसे उसने भयभीत होकर धीरे-धीरे हिलाला के साथ उसने धर्मनिष्ठ राणी को प्रणाम किया।
उन दोनों को हाथ जोड़कर प्रणाम करते हुए देखकर महाभाग्यशाली राणी कोमल व गंभीर शब्दों में बोली।
राजमाता बोली - युद्ध के उत्साह से पूर्ण, मेरे प्राणों के समान प्रिय पुत्र पन्हाळ के किले को शत्रुओं ने चारों ओर से घेर रखा है।
वहां पर स्वामी को छोड़कर व सारी लज्जा को भुलाकर तुम दोनों शत्रु के डर से लौट आये यह आश्चर्य है।
मेरे उस अकेले पुत्र को मैं खुद छुड़ाने का प्रयत्न करुंगी और जोहर की गर्दन आज युद्ध में से लेकर आउंगी।
जिनके बिना ये दिशाएं बड़े अरण्य के समान सुनसान दिख रही है। उस सिंह के समान पराक्रमी पुत्र को मैं जल्दी से ले आउंगी।
विष्णु का अवतार ऐसा वह मेरा एकलौता पुत्र यदि मुझे क्षणभर नहीं दिखा तो मैं प्राण छोड़ दूंगी।
तुम रात यहां मिलकर शत्रुओं से उलझे रहो, मैं खुद उस शत्रु जोहर से लड़ती हूं।
माता के इस प्रकार बोलने के कारण डरा हुआ, वह सेनापति क्षुब्ध होकर जिनका आचरण पवित्र है, ऐसे उस राजमाता से बोला।
चमूपति बोला - देवी भगवती के प्रभाव से वह महासामर्थ्यशाली व पराक्रमी स्वामी सम्पूर्ण जगत का पालन कर रहा है, उन्हें सत्कार्य की अपेक्षा नहीं है।
इसलिए उनकी आज्ञा से जाकर विजापुर को जीतकर तुम्हारा कल्याण हो, ऐसा मैं मुगलों के साथ युद्ध करने के लिए फिर से आया हू।
दृढनिश्चयी आप मेरी रक्षा करें, उधर वह अत्यन्त निर्भयी व विजयी शिवाजी है ही।
अपराजयी, योद्धाओं में श्रेष्ठ ऐसे उस धन्य अपने शिवाजी को कब देख पाउं और कब शत्रुओं के साथ युद्ध करूं, ऐसा मुझे लग रहा है।
ये सारे सैनिक मुगलों से लड़ेगे और मैं वहां जोहरादि शत्रुओं के साथ लडूंगा।
इधर शिवाजी के सैनिकों ने अभी अत्यधिक प्रयत्न से रक्षित किए हुए किल्ले को मुगल आज नहीं ले पायेंगे।
इस प्रकार सेनापति ने उस समय उन्हें निवेदन किया और धैर्यपूर्वक पन्हाळगड़ की और चल दिया।
शीघ्रता से घोड़े पर बैठकर हाथ में तलवार लेकर निकले हुए उस ओर कुल के धैर्यशाली सेनापति के पीछे छः प्रकार की सेनाएं भी निकल पड़ी।
हाथी के शुंड से उड़ायी हुयी धूल से धूसरित ध्वज को वह सामर्थ्यशाली क्षत्रिय सेना को लेकर चल पड़ा।
उस सेनापति और हिलाला के द्वारा रक्षित एवं शत्रुसेना का आने का समाचार पाकर, उसको रोकने के लिए जोहर ने भाला और पट्टी को चलाने वाले बहुत सारे योद्धा वहां भेज दिए।
उसके बाद वे बड़े गर्व के साथ, भाला, पाश एवं धनुर्धारी वे सभी शिदी शिवाजी के उस बहुत बड़ी व समृद्ध सेना को मार्ग में ही रोककर शस्त्र फेंककर लड़ने लगी।
वहां पर शत्रु के साथ-साथ हिलाला का भी युद्ध हो गया, उसमें बाण से शिर अलग व भाले से हाथ तोड़ दिये गए।
तब हिलाला का क्रोधी व अभिमानी सामर्थ्यशाली पुत्र वाहवाह शत्रु के व्यूह में घुस गया।
बड़े व लाल आखों वाला, शत्रुओं की छाती को फाड़ने वाला, वह युवा अपने हाथों की चपलता को दिखाने वाला, बड़ा ही दर्शनीय लग रहा था।
उसके बाद अनेक शत्रों से लड़ने वाला अभिमानी उस वाहवाह को महायुद्धाओं ने युद्ध के अग्रभाग में ही घोड़े से गिरा दिया और वह बेहोश हो गया।
जिसके शरीर में भाला घुसा हुआ है, ऐसे घायल चित्तवाले वाहवाह को शत्रु हर्ष के साथ अपने शिविर में ले गए।
अपने आत्मा के समान उस पुत्र को शत्रु को ले जाते समय हिलाला भी छुड़ा नहीं पाया।
जोहर के योद्धा ऐसे क्रोध के साथ लड़े की हिलाला आदि सभी वीर इधर-उधर भागने लगे।
यह बात सुनकर पृष्ठभाग की रक्षा करने वाला सेनापति हिलाला अपने वीर पुत्र के लिए मन में शोक करने लगा।
इस प्रकार नेताजी आदि के प्रतिदिन लड़ते हुए भी उन्हें पन्हाळ किले की ओर जाने का मौका नहीं मिला।
इस प्रकार सेनापति का पराजय सुनकर, शिवाजी राजा को, इंद्र को जंभासुर पर जैसा क्रोध आया था, वैसे ही जोहर के प्रति क्रोध आया।
एक बार सुव्यवहारी राजा के सुखागार में सोते समय, उसके स्वप्न में वर देने वाली तुकाजा भवानी ने दर्शन दिये।
तब वह महासामर्थ्यशाली जगत् माता, सामर्थ्यशाली राजा को प्रणाम करते हुए बोली।
तुळजादेवी बोली - मुगलों ने आकर चांकण का किला जीत लिया है, इसलिए पुत्र तुम यहां मत रुको, कुछ भी करके यहां से निकलो।
तिमि मछली के जबड़े में फंसे हुए गले के समान, मुगलों के विजयरूपी मुख में फंसा हुआ चाकण का किल्ला बड़े अनर्थ का कारण होगा।
हे राजन्! शीघ्रता से राजगढ़ जाओ और अपने राज्य की रक्षा करो। तुम्हारी वृद्धमाता तेरे बिना दुःखी हो रही है।
थोड़ी सेना के साथ तुम यहां से निकल जाओ, किल्ले पर तुम्हारे योद्धा जोहर से लड़ लेंगे।
मैं अपनी माया से जोहर को मोहित कर दूंगी और संसार में तुम्हारे पराक्रम की अत्यधिक कीर्ति फैलाउंगी।
इस पापी के दिन भर गये हैं ये ज्यादा दिन जीवित नहीं रहेगा, दूसरे रूप में मृत्यु इसे ग्रस लेना चाहती है।
इस प्रकार उसे आज्ञा देकर देवी लुप्त हो गई, परन्तु जाग जाने पर शिवाजी ने बार-बार उसी का वंदन किया।
तदनन्तर चारों और से शत्रुसेना से घिरे हुए, घने बादलों के समूह को देखकर नाचने वाले मोर, सभी ओर फैले हुआ घना एवं काला जंगल, गदगद एवं गंभीर आवाज करने वाले झरें जिससे बह रहे थे, ऐसे उस पन्हाळ के किले से अपनी सामर्थ्यानुसार बाहर जाने के लिए तैयार होकर बड़ी सेना को वहां रखने की इच्छा से त्र्यम्बक भास्कर नामवाला, लोकप्रसिद्ध, सम्मान्य धैर्यशाली ब्राह्मण को अपनी बुद्धि से सुनिश्चित करके, शत्रु समूह की निन्दा करने वाले शिवाजी ने यथायोग्य भाषण किया।
राजा बोला - देखो! रात-दिन हथियारों से लड़ते हुए पराक्रम से युक्त हमने यहां पर चैत्र आदि चार महिने बीता दिए।
जिस महिने में घने काले बादल छाए रहते हैं, ऐसा शुभ पांचवा श्रावण का महिना आ गया है।
अरे! जिनका पराक्रम शत्रुओं के लिए अपरिहार्य है, ऐसे हमारे हाथों से इस दुर्जय किले के तलहटी में रहते हुए जोहर को हम मार न सकें यह आश्चर्य है।
नेताजी आदि सेनापतियों का मन परिवर्तित हो गया है, ऐसी लोकचर्चा है और इनकी यह घेराबंदी हमारे द्वारा समाप्त करनी अशक्य है।
इस बलशाली व पराक्रमी बर्बर को इस बड़ी सेना के सहायता से जीतना असम्भव है, ऐसा मुझे लगता है।
पुणे प्रान्त पर मुगलों द्वारा आक्रमण किया जा रहा है, उनके नाश एवं पराभव के लिए मैं यहां पर ज्यादा समय तक रुकूं यह उचित नहीं है।
उधर साहसी मुगल सेना की पराजय मेरे अलावा किसी और के हाथ से नहीं होगी, ऐसा मुझे लगता है।
इसलिए मैं मुगलों का संहार करने की इच्छा से जल्द ही निकल रहा हू, तब शत्रुओं द्वारा दुर्जयी यह किल्ला तेरे आश्रित रहने दें।
तू यहां पर सेनापति हो, चारों ओर से घेराबंदी किए हुए शत्रुओं के नाश के लिए पराक्रमी हो।
इस शत्रुसेना के व्यूह को तोड़कर अर्जुन के समान निकल कर जाने वाला, मेरे साथ लड़ने वाला कोई भी नष्ट योद्धा बिल्कुल नहीं मिलेगा।
ऐसा बोलकर उस धैर्यशाली त्र्यम्बक भास्करदास को उस किले पर छोड़कर महाराज रात्री के पहले प्रहर में चल पड़े।
आश्चर्य की बात यह है कि महाराज के पालखी में बैठकर जाते समय उनके पीछे छः सौ सैनिक भी गए।
उनका प्रस्थान दुंदुभी के आवाज के समान मधुर ध्वनि ध्वनित हुई तो शत्रु ने उसे मेघगर्जना ही समझा।
कदंब, केतक, कुंद, कुटज इनके सुगंध से भरे हुए, तेजी से उछल कूदकर बहने वाले झरने के बर्फ के सम्पर्क से मंद, ऐसी वायु ने उस समय वहां पर अनुकूल होकर स्वबान्धव के समान उनकी सहायता की।
महाराज के मार्ग पर प्रवास करते समय उनके लिए जासुसों ने पहले ही देखकर रखा हुआ पहाड़ी रास्ता उन्होंने उसी क्षण दिखा दिया।
भवानी देवी के द्वारा मोहित किए हुए शत्रुओं के राजा के समीप से जाने पर भी राजा समझ नहीं पाया।
आगे बीच-बीच में गिरे हुए पत्थरों से उबड़-खाबड़ पर्वत से टुटे हुए तट से गिरते हुए गर्जना करने वाले, नदियों एवं झरनों के कारण अत्यन्त दुर्गम, नीले काई के कारण गाढ़ा कीचड़, जंघाओं तक पवित्र दिखनेवाली लताएं जो कि वृक्षों से लिपटे हुई है, गिरी हुई वर्षा के कारण शेरों की भीड़ गुहा के सामने हो गई, वल्मीक से बाहर आये हुए सापों को मारने की इच्छा से दौड़कर जाने के लिए तैयार खुले पंखों वाले मोर, जिस पर मनुष्यों की दृष्टि तक नहीं पड़ती थी, ऐसे गुप्तचरों ने पहले ही देखकर रखे हुए उस मार्ग को रायगड़ का स्वामी राजा शिवाजी लांघकर गया।
तदनन्तर मार्ग को पार करके आये हुए राजा शिवाजी ने दर्शनीय सभागृह एवं अपने बड़े किले पर चढ़कर वहां पर अपनी सेना को विश्राम मिले इसलिए इच्छानुसार विश्रामालय बनायें।
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