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शिवभारतम् • अध्याय 26 • श्लोक 58
कदम्बकेतकीकुन्दकुटजामोदमेदरः। परिस्फुरन्निर्झराम्भः कणसम्पर्कमन्थरः ।। तस्यानुकूलतां तत्र दधानः पवनस्तदा। आत्मीयं दर्शयामास साहाय्यं स्वजनो यथा ।।
कदंब, केतक, कुंद, कुटज इनके सुगंध से भरे हुए, तेजी से उछल कूदकर बहने वाले झरने के बर्फ के सम्पर्क से मंद, ऐसी वायु ने उस समय वहां पर अनुकूल होकर स्वबान्धव के समान उनकी सहायता की।
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