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शिवभारतम् • अध्याय 26 • श्लोक 1
कवीन्द्र उवाच - अथ त्रस्ते जनपदे विस्रस्ते च महाजने। लुंटिते साहसवटे शूर्पे चाप्यवकुण्ठिते ।। निगृहीते पुण्यपुरे गृहीते चेदिरापुरे। परचक्रचयग्रस्तप्रायचक्रावतीचये ।। आत्मजे शिवराजे च प्रणालाचलवर्तिनि। ऋद्धेऽपि जोहरेणोच्चैः क्रुद्धे तत्रैव युध्यति ।। अहो रणरसोत्साहादाहोपुरुषिकामधात्।। सुता यादवराजस्य शाहपत्नी महाव्रता।
लोग भयभीत हो गए, व्यापारी पलायन कर गए, सासवट को लुट लिया, शर्प को घेर लिया, पुणे पर हमला हो गया, इंदापूर पर कब्जा हो गया, चाकण चोरो का बहुतेक प्रदेश शत्रुसेना के कब्जे में हो गया, पुत्र शिवाजी समृद्ध व अत्यन्त क्रुद्ध हतोत्साहित पन्हाळ किले पर ही जोहर के साथ लड़ रहा था। ऐसे समय जाधवराव की बेटी, शहाजी की धर्मपत्नी जिजाबाई इसी जगह वीररस से परिपूर्ण होकर युद्ध की भाषा बोलने लगी।
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