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शिवभारतम् • अध्याय 26 • श्लोक 61
ततोतरान्तरास्रस्तप्रस्तरप्रोन्नतानतम्। प्रपातपातनिनदन्नदीनदसुदुर्गमम्।। नीलशैवलसंश्लिष्टसक्थिदघ्ननिषद्वरम्। नैकधातुद्रवमिलन्मृदुमृन्मसृणोदरम्।। पल्लवप्रोल्लसद्वीरुत्परिरब्धमहीरुहम्। वर्षाकुलितशार्दूलकुलसंकुलकन्दरम्।। वामलूरान्तरोद्रच्छदंदशूकजिघांसया। कृतकोलाहलं कोपात् प्रचलद्भिः कलापिभिः ।। अदृष्टजनसंचारं चरदृष्टचरं तदा। राजा राजगिरेरीशस्तमध्वानमलंघत ।।
आगे बीच-बीच में गिरे हुए पत्थरों से उबड़-खाबड़ पर्वत से टुटे हुए तट से गिरते हुए गर्जना करने वाले, नदियों एवं झरनों के कारण अत्यन्त दुर्गम, नीले काई के कारण गाढ़ा कीचड़, जंघाओं तक पवित्र दिखनेवाली लताएं जो कि वृक्षों से लिपटे हुई है, गिरी हुई वर्षा के कारण शेरों की भीड़ गुहा के सामने हो गई, वल्मीक से बाहर आये हुए सापों को मारने की इच्छा से दौड़कर जाने के लिए तैयार खुले पंखों वाले मोर, जिस पर मनुष्यों की दृष्टि तक नहीं पड़ती थी, ऐसे गुप्तचरों ने पहले ही देखकर रखे हुए उस मार्ग को रायगड़ का स्वामी राजा शिवाजी लांघकर गया।
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