तदनन्तर चारों और से शत्रुसेना से घिरे हुए, घने बादलों के समूह को देखकर नाचने वाले मोर, सभी ओर फैले हुआ घना एवं काला जंगल, गदगद एवं गंभीर आवाज करने वाले झरें जिससे बह रहे थे, ऐसे उस पन्हाळ के किले से अपनी सामर्थ्यानुसार बाहर जाने के लिए तैयार होकर बड़ी सेना को वहां रखने की इच्छा से त्र्यम्बक भास्कर नामवाला, लोकप्रसिद्ध, सम्मान्य धैर्यशाली ब्राह्मण को अपनी बुद्धि से सुनिश्चित करके, शत्रु समूह की निन्दा करने वाले शिवाजी ने यथायोग्य भाषण किया।
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