मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
शिवभारतम् • अध्याय 26 • श्लोक 44
ततः प्रत्यर्थिसैन्येन परितः कृतमण्डलात्। घनाघनघटालोकलीलाशालिशिखावलात्।। समन्ततस्तत श्यामतमकाननसंकुलात्। जननीलीमिलत्पङ्कपिच्छलोपत्यकातलात्।। गम्भीरगगनदन्निः सरन्नैकनिर्झरात्। प्रणालादचलादात्मबलान्निर्यातुमुद्यतः ।। प्रौढां पताकिनीं तत्र निधित्सुः शिवभूमिपः। पर्यास्नातगुणं लोके नाम्ना त्र्यम्बकभास्करम्।। निर्वार्यमग्रजन्मानमवधार्य धिया स्वया। गर्हिताहितसन्दोहामर्हितां गिरमभ्यधात्।।
तदनन्तर चारों और से शत्रुसेना से घिरे हुए, घने बादलों के समूह को देखकर नाचने वाले मोर, सभी ओर फैले हुआ घना एवं काला जंगल, गदगद एवं गंभीर आवाज करने वाले झरें जिससे बह रहे थे, ऐसे उस पन्हाळ के किले से अपनी सामर्थ्यानुसार बाहर जाने के लिए तैयार होकर बड़ी सेना को वहां रखने की इच्छा से त्र्यम्बक भास्कर नामवाला, लोकप्रसिद्ध, सम्मान्य धैर्यशाली ब्राह्मण को अपनी बुद्धि से सुनिश्चित करके, शत्रु समूह की निन्दा करने वाले शिवाजी ने यथायोग्य भाषण किया।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
शिवभारतम् के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

शिवभारतम् के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें