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अध्याय 20 — विंशतितम अध्याय

शिवभारतम्
41 श्लोक • केवल अनुवाद
कवीन्द्र बोले - तत्पश्चात् एक-दूसरे से मिलने के लिए अत्यन्त उत्सुक, उस कार्य में तत्पर बुद्धिवालें एवं अपनी-अपनी राजनीति से व्यवहार करने वाले उन दोनों दूतों के द्वारा जैसा करार हुआ था, वैसा सब बताता हू। हे पण्डितों ध्यान से सुनो!
अपनी सेना को यथास्थिति रखकर स्वयं अफजलखान सशस्त्र आयें और पालकी में बैठकर आगे जायें, उसकी सेवा के लिए दो तीन ही सेवक होने चाहिए, उसी प्रकार वह प्रतापगढ़ की उपत्यका के पास स्वयं आकर वहीं पर सभा मण्डप में शिवाजी की प्रतीक्षा करें और शिवाजी सशस्त्र आकर उस अतिथि का आदर सत्कार गौरव के साथ यथाविधि करें। दोनों के ही रक्षणार्थ सज्ज, स्वामिनिष्ठ, शूर एवं निष्ठावान् दस-दस सैनिक बाणों की सीमा पर आकर पृष्ठभाग में खड़े हो जायें और दोनों के आपस में मिलने पर सभी लोग आनकारी बाते करें।
इस प्रकार करार करके एवं अंदर से कपटभाव से युक्त होकर एक-दूसरे से मिलने के इच्छुक वे दोनों उस समय सुशोभित हुए।
तत्पश्चात् वह प्रतापगड़ के स्थलभाग की ओर आ रहा है, ऐसा सुनकर शिवाजी महाराज सज्ज होते हुए सुशोभित होने लगे।
पुरोहित के द्वारा निर्दिष्ट विविध प्रकार की विधि से देवाधिदेव शंकर की नित्य की तरह पूजा करके नित्य की दानविधि को करके, थोड़ा भोजन करके, स्वयं शुद्ध सीमित जल को बारंबार आचमन की तरह पीकर उस तुकजा देवी का क्षणमात्र मन में चिन्तन किया, उस समय के लिए उचित वेशभूष को धारण करके लोक में अनुपम अपने मुख को दपर्ण में देखा शीघ्र आसन से उठकर और पुरोहित एवं दूसरे ब्राह्मणों का शीघ्र आसन से उठकर और पुरोहित एवं दूसरे ब्राह्मणों को नमस्कार करके उन सबका शुभ आशीर्वाद लिया, दही, दूर्वा, अक्षत, इनको स्पर्श किया, सूर्यमण्डल देखा। सामने खड़ी बछड़े से युक्त गाय के समीप, जाकर तत्काल सुवर्णसहित उसको गुणवान् ब्राह्मण को दे दिया, अपने पीछे आने के लिए सज्ज पराक्रमी अनुयायियों को प्रतापंगड़ की सुरक्षार्थ नियुक्त किया और मन में कपट को रख समीप आकर स्थित उस यवन की ओर, वह महाबुद्धिमान् शिवाजी अपने अतिथि के संमुख जिस प्रकार जाना चाहिए, उस स्नेहभाव से गया।
उत्तम कवच को धारण किया हुआ, शिवाजी राजे भोसले, कर्णाभरण को धारण करने वाले, सफेद पगड़ी से एवं केसर के छिड़काव किये गए अंगरखे से वह अत्यन्तं सुशोभित हो रहा था। उस बज्रयुक्त शरीर के लिए उस कवच की क्या जरूरत है?
एक हाथ में तलवार और दूसरे हाथ में पट्टे को धारण करने वाला वह शिवाजी राजा, नंदक तलवार एवं कौमुदकी गदा को धारण करने वाले विष्णु के समान दिख रहा था।
पुनः किले के तट से सिंह की तरह बाहर निकलकर, शीघ्र पगों को रखते हुए, अत्यन्त समीप आकर खड़े हुए, अंकुशाग्र के समान सुन्दर, विशाल और लंबी दाढी से भयंकर दिखने वाले, धैर्यवान् एवं धैर्यदृष्टि से युक्त शिवाजी को शत्रु ने देखा।
जैसे इन्द्र ने वृत्र को देखा उसी प्रकार शिवाजी ने भी मुस्कुराते हुए सामने स्थित उसकी दृष्टि से दृष्टि को स्वयं मिलाया।
क्रोधित यम की तरह सामने खड़े हुए उसने दक्ष वीर शिवाजी को अपने पर विश्वस्त करने के लिए अपने हाथ में स्थित अबाधगति वाली तलवार को उस क्रोधित, कपटी दुष्ट ने पास में खड़े हुए अपने सेवक के हाथ में दे दिया।
तत्पश्चात्, मिथ्या स्नेह दिखाकर, प्रतिकूल भाग्य से हत वह अफजलखान उससे उंचे स्वर में बोला।
अफजल बोला - अरे! मिथ्या युद्धोत्साह को धारण करने वाले एवं अत्यन्त स्वच्छंद व्यवहार करने वाले, नीतिमार्ग को छोड़कर कुमार्ग को क्यों धारण करते हो?
आदिलशाह की, कुतुबशाह की या फिर महाबलवान् दिल्लीपति की भी सेवा नहीं करता है और न हीं उन्हें मानता है और अपने पर गर्व करता है।
अतः आज मैं दुर्विनीत तुझको दण्ड देने के लिए आया हू। यह किला मुझे दें, लालच छोड़ दें और मेरी शरण में आजा।
मैं तुझे अपने हाथ से पकड़कर तथा बिजापुर ले जाकर, अल्लीशाह के समाने तेरे मस्तक को झुकवाते हुए उस प्रतापी स्वामी से हाथ जोड़कर निवेदन करूंगा और हे राजा, तुझे फिर उससे अत्यन्तं वैभव को प्राप्त करवाउंगा।
अरे! शहाजी राजा के पुत्र, बच्चे, अपनी होशयारी को छोड़कर अपने हाथ को मेरे हाथों में दें और आलिंगन कर।
इस प्रकार बोलकर उसने उसकी गर्दन को बाएं हाथ से पकड़कर दूसरे दाएं हाथ से उसके पेट में कटार घुसा दी।
वल्लभ लोगों के द्वारा धीरे-धीरे लेकर जाते हुए घोड़ों के पीठ पर स्थित घुड़सवार को उतारने पर भी कष्ट से घोड़े आरोहित हुए।
चढाई से गिरने के भय से हाथों से पकड़ी हुई झाड़ियां उखड़कर गिर गई और कुछ लोग नीचे मुंह पर गिर गये।
ऊपर आरोहण करने वाले हाथियों के पैरों के प्रहार से निकलकर गिरने वाले बड़े-बड़े पत्थरों से नीचे के लोग विनाश को प्राप्त हो रहे थे।
लताओं के विस्तार से मिश्रित बांस के ऊपर से जाने वाली उस सेना के ध्वज एवं छाते फट गये।
अत्यन्त मदमस्त हाथियों के सुड के स्पर्श के भय से वहाँ कुछ लोगों ने पर्वत के तट से गिरकर प्राणों को त्याग दिया।
ऊंचे पर्वत के तट से हाथ-पैरों के फिसलने के कारण से कुछ लोगों ने दूसरे भी अनेक लोगों को अपना साथी बनाया।
इस प्रकार पर्वत पर चढ़कर यवनों की संपूर्ण सेना अतिशय श्रांत होने पर भी उसने धैर्य धारण करके दूसरी तरफ उतरने की इच्छा की।
पर्वत के समान हाथियों ने उस पर्वत पर चढ़कर वे अपने मद को धीरे-धीरे छोड़ते हुए नीचे उतर गये।
जिस प्रकार उस पर्वत पर चढ़कर उन्होंने स्वर्ग देखा उसी प्रकार उससे उतरकर उन लोगों ने मानो पाताल को देखा हो।
तत्पश्चात् पर्वत के मध्यभाग में स्थित गुफा के समान गहरी, सिंह, बाघ, सुअर, भालू, इनके द्वारा आश्रित, इंद्रनीलमा के समान काली झाड़ियों से युक्त, मानो वज्र ही हो, अंधकाररूपी सागर में उत्पन्न हुई मानों पातालभूमि हो, तीनों लोगों को जीतने वाले उत्कृष्ट गुणशाली शिवाती के द्वारा नित्य रक्षित, सूर्य के किरणों के द्वारा तल को स्पर्श न की हुई, सघन छाया से युक्त, ऐसी उस जयवल्ली को पास में आकर अफजलखान ने देखा।
उस बलवान् अफजलखान के उस जयवल्ली के पास आने पर यह मेरे हाथों में आ गई, ऐसा वह अपने में चिंतन करने लगा।
वह जयवल्ली के पास आ गया है, ऐसा सुनकर शिवाजी को भी यह सौभाग्य से मेरे हाथों में आ गया है, ऐसा प्रतीत होने लगा।
तत्पश्चात् भय से मानो उत्साहरहित होकर बास के वृक्षों से व्याप्त कुमुद्दती के तट पर शत्रु ने आश्रय प्राप्त किया।
जिस भयंकर स्थान पर उसके सैनिक भयभीत हो गये थे, उस स्थान पर वह अकेला अफजलखान भयभीत नहीं हुआ।
अत्यन्त ऊंचे एवं विशाल तंबुओं से सुशोभित, जंजीरों से खूँटों में बांधे हए हाथी थे, जमीन में गाड़े गये खूंटों से बांधे हुए घोड़ों के समूह से युक्त, तत्काल बांधे गए अनेक ऊँटों के समूह से व्याप्त, बिक्री योग्य वस्तुओं से परिपूर्ण, दुकानों से सुशोभित, इधर-उधर आने-जाने वाले लोगों के समूह की ध्वनियों से परिपूर्ण, अत्यधिक दूर होते हुए भी समीप वनप्रदेश में अत्यन्त छोटा दिखने वाला वह सेना का दृश्य होते हुए भी वह अदृश्य हो गया।
शिवाजी और अफजलखान, इन दोनों ने कुशल पूछने के लिए अपने-अपने दूत एक-दूसरे के पास भेजें।
शिवाजी के अंतःकरण को अफजलखान ने पहचान लिया और अफजलखान के भी अंतःकरण को शिवाजी ने पहचान लिया। विधाता ने ही केवल उसको सत्यरूप में जाना, अन्य लोगों ने संधि हो रही है, ऐसा समझा।
इस आये हुए अतिथि को एवं उसके पुत्रों को भी किसी प्रकार मुझे अपने शिष्टाचार का अनुसरण करके उपहार देना चाहिए।
मुसेखान, अंकुशखान, याकुत, अंबर उसी प्रकार हसनखान और अन्य सभी को तथा बड़े चाचा मंबाजी राजे, इसको भी पृथक् पृथक् उपहार देने चाहिए और सभी प्रकार के रत्नों की परीक्षा करवा लेनी चाहिए।
इस प्रकार उस राजा ने जब व्यापारी बुलवाएं तब उस अफजलखान की आज्ञा से वे शिवाजी के पास आएं।
फिर अपने-अपने द्वारा लाए गए उन रत्नों को उन व्यापारियों ने शीघ्र लेने वाले शिवाजी को दिखाया।
उस अफजलखान की सेना से वहाँ बुलवाये गए व्यापारियों से उसने सम्पूर्ण रत्नों को ले लिया और उन सबको अपने पास ही रख लिया। तब उन लालची एवं दैव के कारण से विनष्ट बुद्धि वाले मूर्ख व्यापारियों ने, अत्यन्त लालच की आशा से हम पर्वत की चोटी पर चारों ओर से घिर गये हैं, इसको नहीं पहचाना।
उस शिवाजी राजे ने मेरे पर विश्वास किया है, अतः मैं उसके पास तत्काल जाकर मैत्री करने का कपट करके अपनी गुप्त कटार को स्वयं उसके पेट में घुसाकर आज शीघ्र ही देवों के मन्दिरों में भी अत्यन्त भय को उत्पन्न करूंगा।
इस प्रकार उन यवनों द्वारा अपने मन में चिन्तित कपट को जानकर वह शिवाजी उन सबका फल उसको युद्ध में देने के लिए किस प्रकार सज्ज हुआ, यह सब मैं बताऊंगा, उसके यश का मधुर वृतांत ही अमृत है, उसके आगे अमृत की बातें व्यर्थ है।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
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