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शिवभारतम् • अध्याय 20 • श्लोक 39
आहूतेभ्यः स तस्मादफजलकटकात्तत्र तेभ्यो धनिभ्यः सर्वाण्यादत्त रत्नान्यथ निजसविधे तान् समस्तान्यधत्त । लुब्धात्मानस्तदानीं विधिविहतधियो भूरिमारानुरोधा दशा नाज्ञासिषुस्ते बत गिरिशिखरे सर्वतः स्वं निरोधम् ॥
उस अफजलखान की सेना से वहाँ बुलवाये गए व्यापारियों से उसने सम्पूर्ण रत्नों को ले लिया और उन सबको अपने पास ही रख लिया। तब उन लालची एवं दैव के कारण से विनष्ट बुद्धि वाले मूर्ख व्यापारियों ने, अत्यन्त लालच की आशा से हम पर्वत की चोटी पर चारों ओर से घिर गये हैं, इसको नहीं पहचाना।
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