मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
शिवभारतम् • अध्याय 20 • श्लोक 27
अथ पर्वतमध्यस्थां गंभीरां कंदरामिव । सिंहव्याघ्नवराहक्षेतरक्षुकुलसेविताम् ॥ वज्रपाणिमणिश्याम- वनां वज्रमयीमिव । तमोऽबुनिधिसंभूतां ततां विषलतामिव ॥ तलातलस्येव महीमद्दीनगुणशालिना ।। त्रिजगज्जयिना नित्यं शिवेन परिपालिताम् ॥ दिवाकरकरास्पृष्टतलां प्रच्छायसंकुलाम् । अभ्यागच्छन्नफजलो जयवल्लीं व्यवलोकत ॥
तत्पश्चात् पर्वत के मध्यभाग में स्थित गुफा के समान गहरी, सिंह, बाघ, सुअर, भालू, इनके द्वारा आश्रित, इंद्रनीलमा के समान काली झाड़ियों से युक्त, मानो वज्र ही हो, अंधकाररूपी सागर में उत्पन्न हुई मानों पातालभूमि हो, तीनों लोगों को जीतने वाले उत्कृष्ट गुणशाली शिवाती के द्वारा नित्य रक्षित, सूर्य के किरणों के द्वारा तल को स्पर्श न की हुई, सघन छाया से युक्त, ऐसी उस जयवल्ली को पास में आकर अफजलखान ने देखा।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
शिवभारतम् के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

शिवभारतम् के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें