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शिवभारतम् • अध्याय 20 • श्लोक 41
इत्थं चेतसि चिंतितं बत निजे म्लेच्छेन तेनच्छलम्। तद्विज्ञाय शिवः स एष सकलं सद्यस्तदीयं फलम्। तस्मै दातुमथोद्यतो युधि यथा वक्ष्यामि सर्वं तथा मन्ये तद्यशसा सुधामधुकथा पीयूषवार्ता वृथा।। इत्यनुपुराणे सूर्यवंशे कवींद्रपरमानंदप्रकाशितायां साहस्त्र्यां संहितायामफजलागमनं नाम विंशोऽध्यायः ॥
इस प्रकार उन यवनों द्वारा अपने मन में चिन्तित कपट को जानकर वह शिवाजी उन सबका फल उसको युद्ध में देने के लिए किस प्रकार सज्ज हुआ, यह सब मैं बताऊंगा, उसके यश का मधुर वृतांत ही अमृत है, उसके आगे अमृत की बातें व्यर्थ है।
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