स्वयं विहितसंधोऽपि न संघास्यति यद्यसौ। तर्हि विघ्नन्तु तत्सेना जातेऽस्महुन्दुभिध्वनौ ।।
अतः आज मैं दुर्विनीत तुझको दण्ड देने के लिए आया हू। यह किला मुझे दें, लालच छोड़ दें और मेरी शरण में आजा।
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