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शिवभारतम् • अध्याय 20 • श्लोक 5
देव्युवाच - अभिष्ट्य सहखेण नाम्नां स्थितमथाग्रतः। I तमुवाचेति सा देवी सुदती सस्मितानना।। उपैत्यफजलो नाम योऽयं यवनपुंगवः । स एष सच्छलो वत्स त्वया सह युयुत्सते।। कलिकालतरोर्मूलं प्रतिकूलं दिवौकसाम्। तमिमं यवनात्मानं दुर्भदं विद्धि दानवम् ।। अवध्यं सर्वदेवानां दशाननामिवापरम्। सहितं सर्वसैन्येन मोहितं मायया मया।। सहसैव समायातमंतकस्य तवांतिके। तमेनमसिपातेन महता भुवि पातय ।। तममुं हतमेवेति त्वमवेहि महीपते ।। उद्भवन्तं निरोधाय धर्मस्येह मुहुर्मुहुः। क्षरदुधिरधारार्द्रप्रतीकमपमस्तकम्। स्रस्तबाहुलतं व्यस्तप्रसारितपदद्वयम् ।। गृध्रगोमायुभल्लूकारिष्टोत्कृष्टांत्रसंचयम्। पश्यन्तु विबुधास्सर्वे तमिमं भुवि ।।
पुरोहित के द्वारा निर्दिष्ट विविध प्रकार की विधि से देवाधिदेव शंकर की नित्य की तरह पूजा करके नित्य की दानविधि को करके, थोड़ा भोजन करके, स्वयं शुद्ध सीमित जल को बारंबार आचमन की तरह पीकर उस तुकजा देवी का क्षणमात्र मन में चिन्तन किया, उस समय के लिए उचित वेशभूष को धारण करके लोक में अनुपम अपने मुख को दपर्ण में देखा शीघ्र आसन से उठकर और पुरोहित एवं दूसरे ब्राह्मणों का शीघ्र आसन से उठकर और पुरोहित एवं दूसरे ब्राह्मणों को नमस्कार करके उन सबका शुभ आशीर्वाद लिया, दही, दूर्वा, अक्षत, इनको स्पर्श किया, सूर्यमण्डल देखा। सामने खड़ी बछड़े से युक्त गाय के समीप, जाकर तत्काल सुवर्णसहित उसको गुणवान् ब्राह्मण को दे दिया, अपने पीछे आने के लिए सज्ज पराक्रमी अनुयायियों को प्रतापंगड़ की सुरक्षार्थ नियुक्त किया और मन में कपट को रख समीप आकर स्थित उस यवन की ओर, वह महाबुद्धिमान् शिवाजी अपने अतिथि के संमुख जिस प्रकार जाना चाहिए, उस स्नेहभाव से गया।
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