प्रणमन्तं तु तं देवी समुत्थाप्यात्मपाणिना । दृशा दयार्द्रया भक्तमपश्यज्जगदीश्वरी ।।
तत्पश्चात् वह प्रतापगड़ के स्थलभाग की ओर आ रहा है, ऐसा सुनकर शिवाजी महाराज सज्ज होते हुए सुशोभित होने लगे।
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