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शिवभारतम् • अध्याय 20 • श्लोक 2
विलसन्नीलवसनां नीलधम्मिल्लशालिनीम्।अतीव सुकुमारांगीं कुमारीवेषधारिणीम्।। पूर्णेन्दुवंद्यवदनां इन्दीवरविलोचनाम्। मन्दस्मितामभिनवप्रवालतुलिताधराम् ।। भ्राजिष्णुभालतिलकां रत्नरंजितकर्णिकाम्। मनोज्ञनासिकान्यस्तचित्ररत्नमयूरिकाम्।। मृदुबालतां पद्महस्तां सुललितांगुलिम्। रत्नरश्मिकुलाकीर्णकंकणां शुभलक्षणाम् ।। कंठसंसक्तगुच्छार्थगुच्छरलललन्तिकाम्। सुवर्णसुमनः श्लिष्टनीलकंचुलिकावृताम्।। आनाभिविलसद्धारा रत्नकांचीकृतश्रियम्। वरदां विश्वजननीमवनीपतिरैक्षत ।।
अपनी सेना को यथास्थिति रखकर स्वयं अफजलखान सशस्त्र आयें और पालकी में बैठकर आगे जायें, उसकी सेवा के लिए दो तीन ही सेवक होने चाहिए, उसी प्रकार वह प्रतापगढ़ की उपत्यका के पास स्वयं आकर वहीं पर सभा मण्डप में शिवाजी की प्रतीक्षा करें और शिवाजी सशस्त्र आकर उस अतिथि का आदर सत्कार गौरव के साथ यथाविधि करें। दोनों के ही रक्षणार्थ सज्ज, स्वामिनिष्ठ, शूर एवं निष्ठावान् दस-दस सैनिक बाणों की सीमा पर आकर पृष्ठभाग में खड़े हो जायें और दोनों के आपस में मिलने पर सभी लोग आनकारी बाते करें।
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