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शिवभारतम् • अध्याय 20 • श्लोक 40
विश्रब्धो मयि वर्तते शिवमहीपालः स तस्मादहम् तस्योपांतमुपेत्य सांप्रतममुं सामोपधिं संश्रयन् । गुप्तामात्मकटारिकां तदुदरे गाढं निखाय स्वयं देवानामपि मंदिरेऽद्य सुतरां सद्यो विधास्ये भयम् ॥
उस शिवाजी राजे ने मेरे पर विश्वास किया है, अतः मैं उसके पास तत्काल जाकर मैत्री करने का कपट करके अपनी गुप्त कटार को स्वयं उसके पेट में घुसाकर आज शीघ्र ही देवों के मन्दिरों में भी अत्यन्त भय को उत्पन्न करूंगा।
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