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शिवभारतम् • अध्याय 20 • श्लोक 32
ततः प्रोच्छ्रायित्तोहामपटमंडपमंडितम् । निवद्धनिगडालाननियंत्रित मद्विषम् ॥ निखातशंकुसंबद्ध सैंधवश्रेणिसंयुतम् । सद्यः संदानितानेकक्रमेलककुलाकुलम् ॥ पण्यपूर्णापणाकीर्णविपणिभ्राजितांतरम् । व्रजदावजदुद्भांतजनस्वनभरान्वितम् ॥ अत्यायतं वनावन्यामनायतमिव स्थितम् । दृश्यमप्यादे तत्र तदनीकमदृश्यताम् ॥
अत्यन्त ऊंचे एवं विशाल तंबुओं से सुशोभित, जंजीरों से खूँटों में बांधे हए हाथी थे, जमीन में गाड़े गये खूंटों से बांधे हुए घोड़ों के समूह से युक्त, तत्काल बांधे गए अनेक ऊँटों के समूह से व्याप्त, बिक्री योग्य वस्तुओं से परिपूर्ण, दुकानों से सुशोभित, इधर-उधर आने-जाने वाले लोगों के समूह की ध्वनियों से परिपूर्ण, अत्यधिक दूर होते हुए भी समीप वनप्रदेश में अत्यन्त छोटा दिखने वाला वह सेना का दृश्य होते हुए भी वह अदृश्य हो गया।
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