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अध्याय 18 — अष्टादश अध्याय

शिवभारतम्
39 श्लोक • केवल अनुवाद
पण्डित बोले - पुणे शहर में रहने वाले शिवाजी की उपेक्षा करके वह दुष्ट अपनी सेना के साथ वैराट प्रदेश किस कारण से गया?
कवीन्द्र बोले - उस घमण्डी एवं कालयवन के समान तेजस्वी अफजलखान यवन ने शिवाजी को जीतने के लिए, स्वामी की आज्ञा से शीघ्र प्रस्थान करके वैराट प्रदेश में ही किस कारण से प्रवेश किया वह मैं बताता हूं, हे पण्डितों ध्यान से सुनो।
बाजराज एवं उन्मत्त कृष्णराज और उन दोनों के पिता महान् बलवान् चन्द्रराज को युद्ध में मार करके, गुप्तमार्ग से युक्त, सह्याद्री के किनारे बसी हुई, सघन वृक्षों से युक्त तथा किले के आश्रय से युक्त, जागरुक सैनिकों के कारण से भयंकर एवं पर्वतों के मध्य में स्थित, ऐसी जयवल्ली नामक दुर्जेय नगरी को शिवाजी ने अधिग्रहीत किया।
जो-जो चन्द्रराज के सहायक एवं सगे संबन्धी थे, उन सबको बलवानों में बलशाली उस वीर शिवाजी ने काट दिया।
तब चन्द्रराज का बन्धु जो प्रताप वर्मा था वह शिवाजी के भय से आदिलशाह के पास चला गया।
चन्द्रराज के राज्य की आकांक्षा करने वाले उस प्रताप वर्मा ने, मन्त्रिवत् मन्त्रियों से युक्त आदिलशाह की चिरकाल तक सेवा करके उसको संतुष्ट किया।
विशाल वन में स्थित उस चन्द्रराज के राज्य को उस शिवाजी राजा से छिनकर तुझे अवश्य ही दूंगा। इस प्रकार आदिलशाह के कहने पर वह अपनी पीड़ा से रहित होकर उसने अफजलखान के आक्रमण के कार्यों में सहयोग किया।
फिर चन्द्रराज के उस अभिमानी बन्धु ने भेद बताकर अफजलखान को बैराट लेकर आया।
जिसके अधीन जयवल्ली हैं, उसके अधीन पूर्णरूप से वैराट प्रान्त है। उसी प्रकार सम्पूर्ण सह्याद्रि एवं समुद्रतट भी है, ऐसा विचार करने पर वह महाबाहु यवन, उसको अधीन करने के लिए पूरी तैयारी के साथ शीघ्र वैराट प्रदेश आया।
फिर सेना के साथ वैराट प्रान्त आकर वह अफजलखान यवन जयवल्ली को शीघ्र अधीन करने का इच्छुक था, उस समय प्रतिरोध करने में तत्पर वह चतुर शिवाजी बड़े अभिमान के साथ यह मेरे लिए है, ऐसा विचार करने लगा।
मेरे पर क्रोधित हुए उस अभिमानी आदिलशाह के द्वारा प्रेषित यह पराक्रमी अफजलखान अपने शक्ति के समान पराक्रम करेगा। अरे! जिसके अत्यन्त दुष्टता के कारण इस कलियुग का माहत्म्य वृद्धि को प्राप्त हो रहा है, वही यह यवन है।
निशुंभ की तरह तेजस्वी उस दुष्ट ने तुळजापुर की भवानी का बड़ा अपमान किया, जो सदैव निर्दयी एवं क्रोधी होने के कारण से पापों का राशि है, मानो आंख में गये हुए तिनके समान ब्राह्मणों को देखते ही मारने का इच्छुक है, मानो पातक का पर्वत ही हो, जो मदमस्त, वर्णाश्रमधर्मों को पूर्णरूप से नष्ट करने के लिए उद्युक्त है, जो सभी धर्मों का निषेध करके अधर्म की वृद्धि कर रहा है, ऐसे उस समीप आये हुए अफजलखान को मुझे मारना ही चाहिए।
यज्ञ के लिए दुध एवं घी इन हवि के द्रव्यों की पूर्ति के लिए ब्रह्मदेव ने पृथ्वी पर गायों का निर्माण किया है।
उनको यह तमोगुणी अफजलखान अरे! प्रतिदिन मार करके धर्म का विनाश करना चाहता है।
यह वसुंधरा देवी वास्तव में धर्म के संयोग से धारण की जाती है, और वह धर्म निःसंदेह देवों द्वारा रक्षित होता है।
इसलिए इस सम्पूर्ण संसार के आधार ऐसे ब्राह्मणों का सर्वदा प्रयत्नपूर्वक पालन एवं सत्कार करना चाहिए।
देवों का ब्राह्मणों का और गायों का पालन मैं ही प्रत्यक्ष प्रत्येक युग में अवतार लेकर करता हूं।
जिसने समुद्र में प्रवेश कर मत्स्यरूप धारण करके युद्ध में शंखासुर को मार दिया एवं वेदों को पुनः लाया, जिसने कछुए का रूप धारण करके मंदर पर्वत को अपने पीठ पर धारण किया और पृथ्वी का आधार बनकर उसको स्थिर किया, जिसने वराह का रूप धारण करके अपने तीक्ष्ण दांतो से पृथ्वी को समुद्र से बाहर निकालकर हिरण्याक्ष को मार दिया, जिस इन्द्रानुज विष्णु ने वामन अवतार लेकर पूर्णतया छल करके बली को रसातल में ले गया, जो सभामण्डप के खम्भे के मध्य से नरसिंह रूप में प्रकट होकर अपने नाखूनों से हिरण्यकशिपु का वक्षःस्थल विदीर्ण कर दिया, जिस भृगुवंश के भूषण रेणु का पुत्र परशुराम ने कार्तवीर्य का विनाश किया और पृथ्वी को निःक्षत्रिय किया, जिसने दशरथ का पुत्र बनकर समुद्र पर सेतु बांधा था एवं एक ही बाण से दस मस्तकों को काट दिया, जिसने वृष्णिवंश का भूषण बनकर शूरसेन के कुल में जन्म लेकर कंसादि दुष्ट मार दिये थे एवं धर्मस्थापना की, वही सभी देवों का सर्वस्व मैं विष्णु ही हूं और सम्पूर्ण पृथ्वी का भार हरण करने के लिए पृथ्वी पर प्रकट हो गया हूं।
यवनों के ये सभी वंश असुरों के अंश होते हैं। ये अपने धर्म के योग से पृथ्वी को डुबाना चाहते हैं।
अतः इन यवनरूपी राक्षसों को मैं मारुंगा और धर्म का निर्भय मार्ग प्रशस्त करूंगा।
जयवल्ली का यह सघन वन ही मुझ सिंह की गुफा है, वहां प्रवेश करने वाला यह शत्रु अफजलरूपी हाथी निश्चित ही विनाश को प्राप्त होगा।
अपने आतंक को न देखने वाला पंखों के बल पर उड़ने वाले पक्षी के समान वह, मेरी चाल में फंसकर निश्चित मृत्यु को प्राप्त होगा।
ऐसा मन में निश्चय करके उस पुरुष श्रेष्ठ शिवाजी ने अपने सेनापति को शत्रु के राज्य का विध्वंस करने का आदेश देकर तथा अपने राज्य को एवं दुर्ग की रक्षा करने में निपुण, हितकारी अधिकारी लोगों को नियुक्त करके, संधिविग्रह आदि छः गुणों में निपुण एवं शत्रुवीरों का मर्दन करने वाला वह शिवाजी स्वतः पदाति सेना के साथ जयवल्ली आया।
फिर जिसका अभिप्राय गुप्त है, जिसका बाहुपराक्रम अपार है, जो शत्रुओं के लिए अजेय है, जो प्रभाव उत्साह एवं मन्त्र इन तीन शक्तियों से युक्त है, जिसका सेना-समूह तैयार है, ऐसा वह विख्यात शिवाजी जयवल्ली में अधिष्ठित होकर स्वयं युद्ध के लिए तैयार होकर बैठा है, ऐसा सुनकर उस सर्वार्थ कुशल शिवाजी को अफजलखान ने जो संदेश भेजा था। हे पण्डितों! वह मैं तुम्हें बताता हूं, सुनो।
अफजलखान बोला - आज जो आजकल पग-पग पर उद्दंडता कर रहा है वह आदिलशाह के अंतःकरण में काटे की तरह चुभ रहा हैं।
निजामशाह के विलय के लिए चले जाने पर स्वयं हस्तगत किये हुए मुख्यप्रदेश को आदिलशाह से संधि करने की इच्छा से मुगलों को दिया, वह पर्वत किलों से परिपूर्ण प्रान्त को शिवाजी राजा ने अपने अधीन कर लिया है।
वहां पर निरन्तर भाग्यशाली तुमने पग-पग पर मुलूख प्रान्त को अधीन करके, कारागार में डाल देने से दण्डापुरी का राजा कुद्ध तथा रुष्ट हैं।
शत्रुओं के लिए अजेय चन्द्रराजा के विस्तीर्ण राज्य पर पराक्रम के साथ आक्रमण करके तुमने वह बलात् हरण कर लिया।
कल्याण और भीमपुरी को भी अधीन करके आपने यवनों के मस्जिदों को गिरा दिया।
जिसके सर्वस्व को हरण करके आपने उसको पीड़ा दी थी, वे यवनरूपी सांप आज भी तुम पर क्रोधित है।
आपने अपने बलाबल का विचार किये बिना ही काजी मुल्लों को कैद करके निर्भयता से अविंधों के मार्ग को रोका था।
जैसे आप निर्भयता से स्वयं चक्रवर्ती राजा के चिह्नों को धारण कर रहे हो और अन्याय से स्वर्ण सिंहासन पर बैठते हो और स्वयं ही मनुष्यों पर निग्रह तथा अनुग्रह करते हो, स्वतन्त्र होकर बंदनीय लोगों को अभिवादन नहीं करते हो, अजेय होने से तुम घुटपुट लोगों से नहीं डरते हो, इसलिए प्रतापी आदिलशाह ने मुझे तुम्हारे पास भेजा है।
आदिलशाह की आज्ञा से जो यह छः प्रकार की सेना मेरे साथ आई हुई है, वह मुझे शीघ्र युद्ध के लिए उद्युक्त कर रही है।
तुम्हारे साथ युद्ध करने के लिए उत्साहित मुसेखानादि वीर एवं जयवल्ली को अधीन करने के इच्छुक सरदार मुझे इस कार्य में प्रोत्साहित कर रहे हैं।
तब, हे राजा! मेरे आदेश से आप सन्धि करो और सभी किले एवं सम्पत्ति को दे दो।
सिंहगड़ और लोहगड़ ये बड़े और सुदृढ़ किले हैं, उसी प्रकार पुरंदरगड़ एवं चक्रवर्तीपुरी चाकण, नीरा और भीमा का मध्यभाग, ये सब महाबलादय, दिल्ली के बादशाह के शरण में जाकर शीघ्र ही वापस कर दो।
जो जयवल्ली तुमने चन्द्रराज के पास से बलात् अधीन कर ली थी, वह यह जयवल्ली भी अल्लीशाह तुमसे मांग रहा है।
शत्रुओं के आये हुए इस प्रकार के पत्र को सुनकर उस सकल राजाओं के शिरोमणि एवं अद्वितीय वीर ने अपने मन में कुछ एक उपाय बनाएं।
सम्पूर्ण संसार के कल्याण के लिए सर्वोत्कृष्ट प्रयत्न करके उस राजा ने उस पत्र का क्या उत्तर भेजा? और तैयार सज्ज उस शिवाजी के अरण्य में वह अभिमानी अफजलखान कैसे गया? वह सम्पूर्ण श्रेयस्कर वृतान्त, हे पण्डितों! मैं तुम्हें बताता हूं, सुनो!
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
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