दुर्नयेन भृशं येन निशुम्भसमतेजसा। अवाज्ञायत वै देवी तुलजापुरवासिनी।। यः सदैवानस्तिदयो रोषणो राशिरंहसाम्। द्विजानक्षिगतानक्षिगतानिव जिघांसति ।। पर्वतः पातकस्येव सर्वतः समुदोद्धतः । पद्धति वर्णधर्माणां रोढुं तो हि व्यवस्थितः ।। निषेद्धा सर्वधर्माणामधर्माणां विवर्धकः । स मया हन्त हंतव्यः स मया समुपागतः ।।
निशुंभ की तरह तेजस्वी उस दुष्ट ने तुळजापुर की भवानी का बड़ा अपमान किया, जो सदैव निर्दयी एवं क्रोधी होने के कारण से पापों का राशि है, मानो आंख में गये हुए तिनके समान ब्राह्मणों को देखते ही मारने का इच्छुक है, मानो पातक का पर्वत ही हो, जो मदमस्त, वर्णाश्रमधर्मों को पूर्णरूप से नष्ट करने के लिए उद्युक्त है, जो सभी धर्मों का निषेध करके अधर्म की वृद्धि कर रहा है, ऐसे उस समीप आये हुए अफजलखान को मुझे मारना ही चाहिए।
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