मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
शिवभारतम् • अध्याय 18 • श्लोक 12
दुर्नयेन भृशं येन निशुम्भसमतेजसा। अवाज्ञायत वै देवी तुलजापुरवासिनी।। यः सदैवानस्तिदयो रोषणो राशिरंहसाम्। द्विजानक्षिगतानक्षिगतानिव जिघांसति ।। पर्वतः पातकस्येव सर्वतः समुदोद्धतः । पद्धति वर्णधर्माणां रोढुं तो हि व्यवस्थितः ।। निषेद्धा सर्वधर्माणामधर्माणां विवर्धकः । स मया हन्त हंतव्यः स मया समुपागतः ।।
निशुंभ की तरह तेजस्वी उस दुष्ट ने तुळजापुर की भवानी का बड़ा अपमान किया, जो सदैव निर्दयी एवं क्रोधी होने के कारण से पापों का राशि है, मानो आंख में गये हुए तिनके समान ब्राह्मणों को देखते ही मारने का इच्छुक है, मानो पातक का पर्वत ही हो, जो मदमस्त, वर्णाश्रमधर्मों को पूर्णरूप से नष्ट करने के लिए उद्युक्त है, जो सभी धर्मों का निषेध करके अधर्म की वृद्धि कर रहा है, ऐसे उस समीप आये हुए अफजलखान को मुझे मारना ही चाहिए।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
शिवभारतम् के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

शिवभारतम् के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें