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शिवभारतम् • अध्याय 18 • श्लोक 30
तुभ्यं कुप्यन्ति तेऽद्यापि यवनाः पवनाशनाः। अपहृत्यापिं सर्वस्वं कृता येषां विडम्बना ।।
जिसके सर्वस्व को हरण करके आपने उसको पीड़ा दी थी, वे यवनरूपी सांप आज भी तुम पर क्रोधित है।
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